Wednesday, 2 June 2021

सात वर्ष में सात अपेक्षाएं।

भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान की प्रधानमंत्री से सात वर्ष में सात अपेक्षाएं :
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१- एक देश , एक चुनाव, एक चुनाव आयोग व एक मतदाता सूची की की नीति बने।

 २- लोकपाल को सक्रिय कर देश के समस्त राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति हो।

३- नागरिकों को सरकारी सेवाएं निर्धारित अवधि में नहीं मिल पा रही है अस्तु सिटीजन चार्टर/ जनहित गारंटी कानून प्रभावी हो।

४- सूचना का अधिकार दम तोड़ रहा है। सूचना प्राप्ति हेतु तीन से पांच साल तक लड़ाई लड़नी पड़ रही है।अस्तु सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन करके तत्काल सूचना दिए जाने,प्रथम अपील पन्द्रह दिन में व द्वितीय अपील एक माह में तय करने की व्यवस्था हो। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा चार के अन्तर्गत सभी सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों एवं उनके परिजनों की चल अचल संपत्तियां सार्वजनिक हो तथा राष्ट्रीय आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश व राज्य आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति की अनिवार्यता हो।

५-  न्यायपालिका को कुछ घरानों के कब्जे से मुक्त कराने हेतु भारतीय न्यायिक सेवा (IJS) का गठन हो।

६- सामाजिक कार्यकर्ताओं व सूचना कार्यकर्त्ताओं  की सुरक्षा हेतु कानून बने।

७- शिक्षा और चिकित्सा निजी हाथों से मुक्त हो।

हरि प्रताप सिंह राठोड़
अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक
जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
मुख्य प्रवर्तक
भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान
9536162424

( सभी सूचना व सामाजिक कार्यकर्ता यह सात अपेक्षाएं माई ग्रीवांस पोर्टल व ट्विटर के माध्यम से प्रधानमंत्री को प्रेषित करें। )

Saturday, 29 May 2021

न्यूज़ पोर्टल की लोकप्रियता के दृष्टिगत भारत सरकार बनाये नीति।



हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष :
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पत्रकारों, सामाजिक/सूचना कार्यकर्त्ताओं की सुरक्षा हेतु बने कानून।

राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर गठित हो शक्ति सम्पन्न आयोग।

चिकित्सा, बीमा व पेंशन योजनाओं का मिले लाभ।

शासन के तीन अन्ग हैं -  विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका। समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने के कारण मीडिया का इतना महत्त्व बढ़ गया कि उसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने लगा।

इसके पीछे पत्रकारों की लम्बी सन्घर्ष गाथा है। इस समय प्रिन्ट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ सोशल मीडिया ने एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। न्यूज़ पोर्टल अति लोकप्रिय हो रहे हैं, भारत सरकार को इसके लिए भी नीति बनानी होगी। सक्रियता बढ़ने से ख़तरे भी बढना स्वाभाविक है। मीडिया कर्मियों पर हमले होना,हत्या हो जाना, परिजनों का उत्पीड़न होना, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों व भ्रष्ट तत्वों द्वारा निरन्तर हमलों,फर्जी मुकदमे लिखे जाने की एक बहुत विशाल श्रन्खला है। 

मीडिया कर्मियों की सुरक्षा को लेकर विभिन्न स्तरों पर आवाज भी उठी। संसद में भी अनेक बार पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की गई। विभिन्न राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर से सुरक्षा को लेकर दिशा निर्देश जारी किए किन्तु कोई कानून नहीं बन सका।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भी ज्यादा शक्ति सम्पन्न नहीं है।
पत्रकारों की सुरक्षा हेतु कानून बनने में सबसे बड़ी बाधा नौकरशाही है। वर्ष 2011 में व्हिसिल व्लोअर प्रोटेक्शन बिल लाया गया जो संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया और राष्ट्रपति के पास वर्ष 2014 से लम्बित है। इस बिल के द्वारा भ्रष्टाचार के विषय उठाने वालों की सुरक्षा के उपाय किए गए हैं।इसी तरह लोकपाल कानून बन जाने के बाद भी आज तक नौकरशाही की वजह से निष्प्रभावी है। नौकरशाही अपने ऊपर किसी भी प्रकार का अंकुश नहीं चाहती और हमारे नेतागण उस पर पूरी तरह से आश्रित है।

पत्रकारों के साथ ही स्वतन्त्र रूप से लोक कल्याण के विषय उठाने वाले सामाजिक व सूचना कार्यकर्त्ताओं की सुरक्षा व संरक्षा हेतु एक  केन्द्रीय कानून की जरूरत है। इस कानून में पत्रकारों, सामाजिक व सूचना कार्यकर्त्ताओं के सम्मान की सुरक्षा की गारंटी हो। इन पर हमला करने वालों की तत्काल गिरफ्तारी हो साथ ही जमानत की व्यवस्था न हो तथा त्वरित न्यायालय में सुनवाई की व्यवस्था हो।

राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में शक्ति सम्पन्न आयोग गठित हो,आयोग में वरिष्ठता व योग्यता के आधार पर पत्रकारों व सामाजिक/सूचना कार्यकर्त्ताओं को भी सदस्य नामित करने की व्यवस्था हो। आयोग की अनुमति के बिना पत्रकारों, सामाजिक/सूचना कार्यकर्त्ताओं के विरुद्ध दान्डिक अभियोग पंजीकृत न हो। 
केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा विभिन्न स्तरों पर गठित समितियों में इन्हें स्थान दिया जावे। जिला मुख्यालयों पर इनके बैठने हेतु भवन की व्यवस्था हो। सरकार की ओर से इन्हे चिकित्सा, बीमा, पेंशन जैसी सुविधाओं से आच्छादित किया जाये। समन्वय हेतु जिला,मन्डल व राज्य स्तर पर प्रशासन के साथ मासिक बैठक का आयोजन हो जिसमें इनकी समस्याओं का तत्काल समाधान हो।साथ ही इनके लिए भी एक आचार संहिता बनाई जावे ताकि इस क्षेत्र में भी आवश्यक सुधार हो सके।

हरि प्रताप सिंह राठोड़
अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक: जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
मुख्य प्रवर्तक
भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान
9536162424




Monday, 24 May 2021

रोकी जाए प्रधान पद की शपथ।

संवैधानिक व्यवस्था व उच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना कर ग्राम पंचायत सदस्य पद का चुनाव अवैध होने के कारण रोकी जाए प्रधान पद की शपथ।
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भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान के मुख्य प्रवर्तक व व्यवस्था सुधार मिशन के जनक हरि प्रताप सिंह राठोड़ एडवोकेट ने प्रदेश की महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव को ट्विटर/ईमेल के माध्यम से पत्र प्रेषित कर प्रधान पद की शपथ रोके जाने की मांग की है।

श्री राठोड़ ने बताया कि उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान व ग्राम पंचायत सदस्य पद चार पदों के चुनाव कराए गए हैं, जिला पंचायत अध्यक्ष व ब्लाक प्रमुख पद के चुनाव कराए जाने शेष है। राज्य सरकार द्वारा संविधान में वर्णित व्यवस्था व उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में पाँच पदों  जिला पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य, ब्लाक प्रमुख, क्षेत्र पंचायत सदस्य व ग्राम प्रधान पद के लिए आरक्षण नीति घोषित की गई तथा पद आरक्षित भी कर दिये गए , किन्तु ग्राम पंचायत सदस्य पद हेतु कोइ आरक्षण नीति नहीं बनाई गई।  फिर भी ग्राम पंचायत सदस्य पद हेतु बिना किसी आरक्षण नीति के अवैध रूप से चुनाव करा दिये गए। ग्राम पंचायत के लगभग तीन लाख पद रिक्त भी रह गए हैं।

श्री राठौड़ ने यह भी बताया कि आरक्षण प्रक्रिया का अनुसरण किये बिना ग्राम पंचायत सदस्य पद हेतु कराया गया निर्वाचन शून्य व अवैध है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में एक भी ग्राम पंचायत में कोरम पूर्ण नहीं है। कोरम के अभाव में प्रधान पद के शपथ के कार्यक्रम को रोका जाना आवश्यक है।

श्री राठोड़ ने माँग की है कि ग्राम प्रधान पद के शपथ ग्रहण पर रोक लगाते हुए, ग्राम पंचायत सदस्य पद का चुनाव शून्य मानते हुए, आरक्षण प्रक्रिया पूर्ण कर सदस्य पद का पुनः चुनाव कराया जावे।

Wednesday, 19 May 2021

ग्राम पंचायत सदस्य पद को क्रियाशील बनाये जाने की आवश्यकता।

ग्राम पंचायतों को सुदृढ़ बनाने के लिए सरकार को उठाने होंगे कुछ महत्वपूर्ण कदम
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उप प्रधान पद की व्यवस्था के साथ ही देना पड़ेगा अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार।
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आठों समितियों को बनाना पड़ेगा क्रियाशील।
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राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा अभी संपन्न हुए पंचायत चुनाव में विश्व का सबसे बड़ा चुनाव कराने की बात कहकर अपनी पीठ थपथपाई गई। उत्तर प्रदेश का पंचायत चुनाव विश्व का सबसे बड़ा चुनाव बनता है सबसे छोटे पद ग्राम पंचायत सदस्य के कारण। उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत सदस्य के 732476 पद है। उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 (1) ग में व्यवस्था दी गई है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में 1000 जनसंख्या पर नौ सदस्य, दो हजार जनसंख्या पर ग्यारह सदस्य, तीन हजार जनसंख्या पर तेरह सदस्य तथा तीन हजार से अधिक जनसंख्या होने पर पंद्रह सदस्य होंगे। धारा 12 की उपधारा 5 (क) में ग्राम पंचायत सदस्यों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

धारा 28, 29 व 30 में समितियों की व्यवस्था की गई है । धारा 28 में भूमि प्रबंधक समिति का प्रावधान है तथा धारा 29 में राज्य की इच्छा अनुसार समितियों के गठन का प्रावधान है। राज्य सरकार द्वारा जिन छ: प्रकार की समितियों के गठन हेतु निर्देश जारी किए गए हैं वे हैं- नियोजन और विकास समिति, शिक्षा समिति, निर्माण कार्य समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति, प्रसाशनिक समिति व जल प्रबंधन समिति। प्रत्येक समिति में छः सदस्य होंगे, एक महिला, एक अनुसूचित जाति व एक पिछड़े वर्ग का सदस्य होना आवश्यक है। राजस्व संहिता में वर्णित व्यवस्था के अनुसार एक ग्राम राजस्व समिति का भी गठन होगा, जिसका उपाध्यक्ष प्रधान पद के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाला प्रत्याशी होगा। धारा 30 में संयुक्त समिति की व्यवस्था दी गई है, जिसके अनुसार आवश्यकता पढ़ने पर दो ग्राम पंचायतें अपने सदस्यो में से आवश्यकतानुसार समिति का गठन कर सकती हैं। इस प्रकार प्रत्येक ग्राम पंचायत में आठ समितियों का गठन अनिवार्य है। 

उत्तर प्रदेश में अभी सम्पन्न हुए पंचायत चुनाव में लगभग दो लाख ग्राम पंचायत सदस्य के पद रिक्त रह गए हैं। इन रिक्त पदों के लिए उप चुनाव कराया जाएगा। नागरिकों ने इन पदों के लिए चुनाव लड़ने हेतु कोई रूचि नहीं दिखाई। अनेक ग्राम पंचायतों में एक भी सदस्य निर्वाचित नहीं हुआ है। जिन ग्राम पंचायतों में ग्राम पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए भी हैं, तो उनके नामांकन प्रधान पद के प्रत्याशियों द्वारा कराए गए हैं। जिस प्रकार नागरिक प्रधान पद के लिए रुचि दिखाते हैं, उस प्रकार सदस्य पद हेतु रुचि का अभाव है। क्योंकि ग्राम पंचायत सदस्य के पद को महत्वहीन बना दिया गया है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में 09 से 15 तक ग्राम पंचायत सदस्य होते हैं, इनकी स्थिति वही है जो नगर पंचायत/नगर पालिका परिषद में सभासद की होती है, नगर निगम में पार्षद की होती है, क्षेत्र पंचायत/जिला पंचायत में सदस्य की होती है तथा विधानसभा में विधायक और संसद में सांसद की होती है।

कहने को ग्राम पंचायत सदस्यों में से आठ प्रकार की समितियां गठित की जाती है। हर ग्राम पंचायत सदस्य एक से अधिक समितियों का सदस्य होता है।  इन समितियों औऱ ग्राम पंचायत की कार्यप्रणाली मात्र कागजों तक ही सीमित रहती है। ग्रान पंचायत सदस्यों तक को पता नहीं होता है कि वे किस किस समिति के सदस्य हैं तथा समिति का उद्देश्य क्या है। यहाँ तक कि उनकी बैठकों में भी कोई भूमिका नहीं रहती है। कब बैठकें आयोजित हो गई, इसकी भी उन्हें सूचना नहीं मिलती है। कुछ समय के पश्चात निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्य यह भी भूल जाते हैं कि वे ग्राम पंचायत सदस्य हैं , यही नहीं निर्वाचक भी भूल जाते हैं कि उन्होंने किसे ग्राम पंचायत सदस्य चुना था।

ग्राम पंचायत सदस्य को मजबूत बनाने में शासन की भी रुचि नहीं है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शासन द्वारा जिला पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य, ब्लाक प्रमुख, क्षेत्र पंचायत सदस्य व प्रधान के पद हेतु आरक्षण नीति 11 फरवरी 2021 को निर्धारित की गई, उस नीति में पाँच पदों जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य व प्रधान के लिए आरक्षण किस प्रकार निर्धारित किया जाएगा, व्यवस्था की गई , किन्तु ग्राम पंचायत सदस्य के आरक्षण का निर्धारण किस प्रकार होगा इसकी व्यवस्था नहीं की गई। 11 फरवरी 2021 की आरक्षण नीति उच्च न्यायालय द्वारा अस्वीकार करने पर पुनः 17 मार्च को नई नीति घोषित की गई, आश्चर्य का विषय यह है कि दूसरी नीति में भी उक्त पाँच पदों के लिए ही आरक्षण निर्धारण की व्यवस्था की गई,  ग्राम पंचायत सदस्य के पद के लिए आरक्षण किस प्रकार किया जाएगा, कोई व्यवस्था नहीं की गई। आरक्षण नीति में कोई व्यवस्था न होने पर भी ग्राम पंचायत सदस्य के पदों को भी आरक्षित कर दिया  गया।

ग्राम पंचायत सदस्यों की पंचायत राज व्यवस्था में भूमिका निर्धारित करने हेतु एवं  सक्रिय बनाये जाने हेतु कुछ व्यवहारिक निर्णय लेने की आवश्यकता है । इसके लिए ग्राम पंचायतों में उप प्रधान का पद पुनः स्थापित करना पड़ेगा। प्रधान के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार ग्राम पंचायत सदस्यों को देना पड़ेगा साथ ही ग्राम पंचायत में समितियों का गठन करके समितियों को क्रियाशील बनाना पड़ेगा। ग्राम पंचायत सदस्यों के व्यवहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी, जिसमें उन्हें उनके अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित कराने के साथ ही पूरी पंचायत राज व्यवस्था से परिचित कराना पड़ेगा।


हरि प्रताप सिंह राठोड
अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक: जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
९५३६१६२४२४


Tuesday, 11 May 2021

उप प्रधान के पद सृजन के साथ ही ग्राम पंचायत सदस्यों को मिले प्रधान के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार।

ग्राम पंचायतों को सुदृढ़ बनाने के लिए सरकार को उठाने होंगे कुछ महत्वपूर्ण कदम
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उप प्रधान, वरिष्ठ/कनिष्ठ उप ब्लाक प्रमुख औऱ जिला पंचायत उपाध्यक्ष की व्यवस्था हो बहाल।
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ग्राम पंचायत सदस्यों को प्रधान के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का मिले अधिकार।
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उत्तर प्रदेश में अभी सम्पन्न हुए पंचायत चुनाव में लगभग दो लाख ग्राम पंचायत सदस्य के पद रिक्त रह गए हैं। इन रिक्त पदों के लिए उप चुनाव कराया जाएगा। नागरिकों ने इन पदों के लिए चुनाव लड़ने हेतु कोई रूचि नहीं दिखाई। क्योंकि ग्राम पंचायत सदस्य के पद को महत्वहीन बना दिया गया है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में 11 से 15 तक ग्राम पंचायत सदस्य होते हैं, इनकी स्थिति वही है जो नगर पंचायत/नगर पालिका परिषद में सभासद की होती है, नगर निगम में पार्षद की होती है, क्षेत्र पंचायत/जिला पंचायत में सदस्य की होती है, विधानसभा में विधायक और संसद में सांसद की होती है।

कहने को ग्राम पंचायत सदस्यों में से सात प्रकार की समितियां गठित की जाती है। हर ग्राम पंचायत सदस्य एक से अधिक समितियों का सदस्य होता है।  इन समितियों औऱ ग्राम पंचायत की कार्यप्रणाली मात्र कागजों तक ही सीमित रहती है। ग्रान पंचायत सदस्यों तक को पता नहीं होता है कि वे किस किस समिति के सदस्य हैं तथा समिति का उद्देश्य क्या है। यहाँ तक कि उनकी बैठकों में भी कोई भूमिका नहीं रहती है। कब बैठकें आयोजित हो गई, इसकी भी उन्हें सूचना नहीं मिलती है। कुछ समय के पश्चात निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्य यह भी भूल जाते हैं कि वे ग्राम पंचायत सदस्य हैं , यही नहीं निर्वाचक भी भूल जाते हैं कि उन्होंने किसे ग्राम पंचायत सदस्य चुना था।

यही स्थिति क्षेत्र पंचायतों में क्षेत्र पंचायत सदस्यों(बी डी सी) एवं जिला पंचायतों में जिला पंचायत सदस्यों की है।

ग्राम पंचायत सदस्य/क्षेत्र पंचायत सदस्यों/जिला पंचायत सदस्यों की पंचायत राज व्यवस्था में भूमिका निर्धारित करने हेतु एवं  सक्रिय बनाये जाने हेतु कुछ व्यवहारिक निर्णय लेने की आवश्यकता है :
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#ग्राम पंचायतों में उप प्रधान का पद पुनः स्थापित किया जावे।

#प्रधान के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार ग्राम पंचायत सदस्यों को पुनः मिले।

#क्षेत्र पंचायतों में उप ब्लाक प्रमुख एवं जिला पंचायतों में जिला पंचायत उपाध्यक्ष के पद पुनः स्थापित किया जावे।

#ग्राम पंचायत सदस्यों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों व जिला पंचायत सदस्यों के व्यवहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था हो, जिसमें उन्हें उनके अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित कराने के साथ ही पंचायत राज व्यवस्था से परिचित कराया जावे।


हरि प्रताप सिंह राठोड
अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक: जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
९५३६१६२४२४