हा हा क्षत्रिय दुर्दशा देखी न जाई।।
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आम चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। सत्ताधारी दल और विरोधी दल अपना कुनवा बढ़ाने में लग गए हैं। स्तर इतना गिर चुका है कि अब तक एक भी चुनाव न जीतने वाले दल भी महत्व पा रहे हैं।
ऐसे में कुछ जातीय संगठन भी सक्रिय हुए हैं, ऐसे जातीय संगठन जो जिनकी कोई उपलब्धि नहीं है, वह सिर्फ चुनाव आने पर ही सक्रिय होते हैं। ब्लाक, नगर , तहसील, जिला और मंडल पर भले ही इनकी टीम न हो लेकिन इनके पास प्रदेश और राष्ट्रीय पदाधिकारियों की फौज है। इन राष्ट्रीय और प्रदेश के पदाधिकारियों की राजनैतिक इच्छाएं है, जिन्हे ये सामाजिक संगठन का आश्रय लेकर पूरा करना चाहते हैं।
मेरी चर्चा का विषय वह जाति है जिसकी संख्या अंग्रेजो द्वारा कराई गई जातीय जनगणना में भारत मे सर्वाधिक थी। आज भी यह जाति देश में सबसे अधिक स्थानों पर निवास करती है, देश में डेढ़ सौ से अधिक लोकसभा क्षेत्रों और पांच सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्र में यह जाति प्रभावी है। किंतु नीति के तहत फर्जी आंकड़ेबाजी में देश की इस सबसे बड़ी संख्या वाली जाति की संख्या कम बताई गई, इस जाति के कल्याण के लिए काम करने वाले संगठन भी इस विषय पर ज्ञान के अभाव में मौन है, उन्हे संगठन के द्वारा जाति का कल्याण नही बल्कि अपनी राजनैतिक इच्छाएं पूरी करनी है।
इन संगठनों ने अपने उपास्य महाराणा प्रताप की जयंती नहीं मनाई किंतु राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने के लिए पंचायतें शुरु कर दी है, इन पंचायतों के मंच के फोटो तो सार्वजनिक होते हैं लेकिन मंच के सामने के फोटो अज्ञात कारणों से कभी सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं। इनका उद्देश्य किसी भी दल से टिकट पाना रहा है। टिकट की जुगत में यह कार्यक्रम करने लगे हैं, इन कार्यक्रमों में जाति के कल्याण के लिए कोई चर्चा नहीं होती। आज़ादी के बाद संसद में प्रतिनिधित्व घटा, राज्य विधान मंडल में प्रतिनिधित्व घटा, सरकारी नौकरी में प्रतिनिधित्व घटा, पंचायतों और सहकारी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व घटा, राजनैतिक दल टिकट देना दूर पार्टी में पद देने से भी परहेज करते हैं। आजादी के बाद सर्वाधिक संपत्तियां इसी बिरादरी की घटी। शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से आज़ादी के बाद सर्वाधिक यही बिरादरी पिछड़ी। देश में सबसे ज्यादा ट्रक और टैक्सी ड्राइवर, रिक्शा चालक, गार्ड (चौकीदार) इसी बिरादरी के हैं। दलितों पिछड़ों की बात तो दूर है, मुसलमानों का सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक स्तर इस बिरादरी से उच्च हुआ है।
आज़ादी के बाद राजनैतिक परिदृश्य देखे तो अब तक एक राष्ट्रपति, एक उप राष्ट्रपति, दो प्रधान मंत्री (जो कार्यकाल पूरा नहीं कर सके), एक दल मे दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष, और दुनिया के सबसे बडे़ और पुराने संगठन के एक बार मुखिया बनने के अलावा और कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है।
किंतु दुर्भाग्य का विषय है कि जब इस बिरादरी के संगठनों के बड़े बड़े पदाधिकारी पगड़ी बांध कर, तलवार पकड़ कर चीखते है (दहाड़ते नही) तो लगता ही नहीं है कि वे ऐसी जाति के लिऐ काम कर रहे हैं जो आजादी की बाद निरंतर विपन्न होती जा रही है।
अभी हाल फिलहाल कई राष्ट्रीय अध्यक्ष सक्रिय हो गए हैं, जिन्हे सक्रिय होने के लिए चुनाव का इंतजार रहता है। इनमे से दो राष्ट्रीय अध्यक्ष संसद सदस्य रह भी चुके हैं। जिस समय एस सी एस टी कानून को कठोर बनाने के लिए संसद में संशोधन विधेयक लाया गया उस समय एक राष्ट्रीय अध्यक्ष लोकसभा में बैठते थे तो एक राष्ट्रीय अध्यक्ष राज्यसभा में बैठते थे, दोनो ही सदन में यह विधेयक पास हो गया लेकिन इन दोनों महानुभावों ने विरोध नहीं किया बल्कि संसद में बैठकर इस काले कानून का समर्थन किया।२०१९ मे टिकट न मिलने पर एक राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तो बिरादरी का आह्वान कर दिया कि वह भाजपा को हराने के लिए वोट करे किंतु बिरादरी ने नही सुनी।
आखिर वह बिरादरी जो देश की डेढ़ सौ से अधिक लोकसभा क्षेत्रों और पांच सौ से अधिक विधानसभाओं में प्रभावी हो, उसकी उपेक्षा करने का साहस किसमे हों सकता है, यह विचारणीय विषय है।
हरि प्रताप सिंह राठोड़
अधिवक्ता
विधिवेत्ता, लेखक, चिन्तक,
सोशल/आर टी आई एक्टिविस्ट
