Monday, 16 October 2023

कैसा नारी शक्ति वंदन...?

कैसा नारी शक्ति वंदन.....?
क्या आम चुनाव में एक तिहाई टिकट महिलाओं को मिलेंगे ?

संसद और राज्य विधानमंडलों में नारी को ३३ प्रतिशत आरक्षण देने हेतु लम्बे अंतराल के बाद बर्ष २०२३ में देश की संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कर दिया, लेकिन इस कानून के लागू होने मे अभी कई बर्ष लगेगे।

प्रारंभकाल से ही सभी राजनैतिक दल महिला आरक्षण के समर्थन में रहें हैं, नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित कराने में सभी राजनैतिक दलों की भूमिका रही है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पारित होने से नागरिकों को लगा कि ये आरक्षण तत्काल लागू हो जायगा, साथ ही २०२४ के आम चुनाव में ३३ प्रतिशत सीट महिलाओं के लिए आरक्षित रहेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ।

अब देखना यह है कि राजनैतिक दल वास्तव में महिलाओ की राजनैतिक भागीदारी चाहते हैं, यदि ऐसा होता तो महिला आरक्षण की चर्चा के समय से ही सभी राजनैतिक दल महिलाओं को संगठन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर,  विभिन्न चुनावों में तिहाई टिकट महिलाओं को देकर महिला आरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जता सकते थे।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित होने के पश्चात पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। इन चुनावों में राजनैतिक दलों द्वारा महिला प्रत्याशियों को वरीयता नहीं दी गई, यहां तक कि इनमें से किसी भी राज्य में महिला को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, यहां तक कि मंत्रिपरिषद में भी पर्याप्त महिला प्रतिनिधित्व नहीं है। कानून पारित होने के बाद लगा था कि राजनैतिक दल इन चुनावों में महिला प्रत्याशियों को वरीयता देगे, किंतु राजनैतिक दलों का रवैया निराश करने वाला रहा है। 

आम चुनाव को लेकर प्रत्याशियों की घोषणा सभी दलों द्वारा की जा रही है, किंतु महिलाओं को टिकट देने के प्रति सभी दल उदासीन है। अभी संपन्न हुए राज्य सभा चुनावों में भी अपेक्षा के अनुरूप महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

बहुजन समाज पार्टी और तृणमूल कांग्रेस को छोड़ दे तो किसी भी राजनैतिक दल मे राष्ट्रीय अध्यक्ष महिला नही है। इन दोनों दलों में महिला नेतृत्व होने के बाबजूद भी पर्याप्त महिला प्रतिनिधित्व नहीं है। अन्य दलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व महिला मोर्चा तक ही सीमित है, दलों की नीति निर्धारण में महिलाओ की भूमिका नगण्य ही है।

२०२४ में पांच महानुभावों को भारत रत्न दिया गया है। इनमें एक भी महिला सम्मिलित नही है।

आम चुनाव २०२४ में राजनैतिक दलों द्वारा नारी शक्ति वंदन मे रूचि न दिखाना "नारी शक्ति वंदन अधिनियम २०२३" के भविष्य को प्रश्नचिन्हित करता है।


हरि प्रताप सिंह राठोड़, अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक
जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन) 
९५३६१६२४२४

Monday, 24 July 2023

हा हा क्षत्रिय दुर्दशा न देखी जाई !!!

हा हा क्षत्रिय दुर्दशा  देखी न जाई।।
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आम चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। सत्ताधारी दल और विरोधी दल अपना कुनवा बढ़ाने में लग गए हैं। स्तर इतना गिर चुका है कि अब तक एक भी चुनाव न जीतने वाले दल भी महत्व पा रहे हैं।

ऐसे में कुछ जातीय संगठन भी सक्रिय हुए हैं, ऐसे जातीय संगठन जो जिनकी कोई उपलब्धि नहीं है, वह सिर्फ चुनाव आने पर ही सक्रिय होते हैं। ब्लाक, नगर , तहसील, जिला और मंडल पर भले ही इनकी टीम न हो लेकिन इनके पास प्रदेश और राष्ट्रीय पदाधिकारियों की फौज है। इन राष्ट्रीय और प्रदेश के पदाधिकारियों की राजनैतिक इच्छाएं है, जिन्हे ये सामाजिक संगठन का आश्रय लेकर पूरा करना चाहते हैं।

मेरी चर्चा का विषय वह जाति है जिसकी संख्या अंग्रेजो द्वारा कराई गई जातीय जनगणना में भारत मे सर्वाधिक थी। आज भी यह जाति देश में सबसे अधिक स्थानों पर निवास करती है, देश में डेढ़ सौ से अधिक लोकसभा क्षेत्रों और पांच सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्र में यह जाति प्रभावी है। किंतु नीति के तहत फर्जी आंकड़ेबाजी में देश की इस सबसे बड़ी संख्या वाली जाति की संख्या कम बताई गई, इस जाति के कल्याण के लिए काम करने वाले संगठन भी इस विषय पर ज्ञान के अभाव में मौन है, उन्हे संगठन के द्वारा जाति का कल्याण नही बल्कि अपनी राजनैतिक इच्छाएं पूरी करनी है।

इन संगठनों ने अपने उपास्य महाराणा प्रताप की जयंती नहीं मनाई किंतु राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने के लिए पंचायतें शुरु कर दी है, इन पंचायतों के मंच  के फोटो तो सार्वजनिक होते हैं लेकिन मंच के सामने के फोटो अज्ञात कारणों से कभी सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं। इनका उद्देश्य किसी भी दल से टिकट पाना रहा है। टिकट की जुगत में यह कार्यक्रम करने लगे हैं, इन कार्यक्रमों में जाति के कल्याण के लिए कोई चर्चा नहीं होती। आज़ादी के बाद संसद में प्रतिनिधित्व घटा, राज्य विधान मंडल में प्रतिनिधित्व घटा, सरकारी नौकरी में प्रतिनिधित्व घटा, पंचायतों और सहकारी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व घटा, राजनैतिक दल टिकट देना दूर पार्टी में पद देने से भी परहेज करते हैं। आजादी के बाद सर्वाधिक संपत्तियां इसी बिरादरी की घटी। शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से आज़ादी के बाद सर्वाधिक यही बिरादरी पिछड़ी। देश में सबसे ज्यादा ट्रक और टैक्सी ड्राइवर, रिक्शा चालक, गार्ड (चौकीदार) इसी बिरादरी के हैं। दलितों पिछड़ों की बात तो दूर है, मुसलमानों का सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक स्तर इस बिरादरी से उच्च हुआ है।

आज़ादी के बाद राजनैतिक परिदृश्य देखे तो अब तक एक राष्ट्रपति, एक उप राष्ट्रपति, दो प्रधान मंत्री (जो कार्यकाल पूरा नहीं कर सके), एक दल मे दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष, और दुनिया के सबसे बडे़ और पुराने संगठन के एक बार मुखिया बनने के अलावा और कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है।

किंतु दुर्भाग्य का विषय है कि जब इस बिरादरी के संगठनों के बड़े बड़े पदाधिकारी पगड़ी बांध कर, तलवार पकड़ कर चीखते है (दहाड़ते नही) तो लगता ही नहीं है कि वे ऐसी जाति के लिऐ काम कर रहे हैं जो आजादी की बाद निरंतर विपन्न होती जा रही है।

अभी हाल फिलहाल कई राष्ट्रीय अध्यक्ष सक्रिय हो गए हैं, जिन्हे सक्रिय होने के लिए चुनाव का इंतजार रहता है। इनमे से दो राष्ट्रीय अध्यक्ष संसद सदस्य रह भी चुके हैं। जिस समय एस सी एस टी कानून को कठोर बनाने के लिए संसद में संशोधन विधेयक लाया गया उस समय एक राष्ट्रीय अध्यक्ष लोकसभा में बैठते थे तो एक राष्ट्रीय अध्यक्ष राज्यसभा में बैठते थे, दोनो ही सदन में यह विधेयक पास हो गया लेकिन इन दोनों महानुभावों ने विरोध नहीं किया बल्कि संसद में बैठकर इस काले कानून का समर्थन किया।२०१९ मे टिकट न मिलने पर एक राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तो बिरादरी का आह्वान कर दिया कि वह भाजपा को हराने के लिए वोट करे किंतु बिरादरी ने नही सुनी।

आखिर वह बिरादरी जो देश की डेढ़ सौ से अधिक लोकसभा क्षेत्रों और पांच सौ से अधिक विधानसभाओं में प्रभावी हो, उसकी उपेक्षा करने का साहस किसमे हों सकता है, यह विचारणीय विषय है।

हरि प्रताप सिंह राठोड़
                 अधिवक्ता
विधिवेत्ता, लेखक, चिन्तक, 
सोशल/आर टी आई एक्टिविस्ट 
९५३६१६२४२४

Saturday, 27 May 2023

नौ वर्ष, नौ अपेक्षाएं

भारत माता की जय !
वंदे मातरम् !
इंकलाब ज़िंदाबाद !

भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान की प्रधानमंत्री से नौ वर्ष में नौ अपेक्षाएं :
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१- एक देश , एक चुनाव, एक चुनाव आयोग व एक मतदाता सूची की नीति बने। राज्य निर्वाचन आयोगों को समाप्त कर स्थानीय निकायों व पंचायतों के चुनाव भारत निर्वाचन आयोग द्वारा ही कराएं जावे।

 २- लोकपाल को सक्रिय कर देश के समस्त राज्यों में लोकपाल अधिनियम की धारा ६३ के अंतर्गत लोकायुक्त की अनिवार्य रूप से नियुक्ति हो।

३- नागरिकों को सरकारी सेवाएं निर्धारित अवधि में मिले, एतदर्थ सिटीजन चार्टर/ जनहित गारंटी कानून को प्रभावी बनाते हुए नियमित निगरानी तंत्र विकसित हो।

४- सूचना का अधिकार दम तोड़ रहा है। सूचना प्राप्ति हेतु तीन से पांच साल तक लड़ाई लड़नी पड़ रही है।अस्तु सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन करके तत्काल सूचना दिए जाने,प्रथम अपील पन्द्रह दिन में व द्वितीय अपील एक माह में तय करने की व्यवस्था हो। धारा चार के अन्तर्गत सभी सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों एवं उनके परिजनों की चल अचल संपत्तियां सार्वजनिक हो तथा केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश व राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति की अनिवार्यता हो।

५-  न्यायपालिका को कुछ घरानों के कब्जे से मुक्त कराने हेतु भारतीय न्यायिक सेवा (IJS) का गठन हो साथ ही नागरिकों के हित में उच्चतम न्यायालय की देश में चार उपयुक्त स्थलों पर पीठ स्थापित हो तथा राज्यों में मंडल स्तर पर उच्च न्यायालय की पीठ स्थापित हो।

६- सामाजिक कार्यकर्ताओं व सूचना कार्यकर्त्ताओं  की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु शीघ्र व्हिसिल ब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट लागू किया जाए।

७- मुफ्त शिक्षा / चिकित्सा और योग्यतानुसार रोजगार की गारंटी हेतु कानून बने। 

८- जन प्रतिनिधियों, उनके परिजनों व संबंधियों की चल अचल परिसंपत्तियों में हो रही गुणोंत्तर वृद्धि की निगरानी हेतु तंत्र विकसित हो।

९- चुनाव लड़ने से पूर्व अर्हता परीक्षा उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता एवम न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारण हेतु लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया जावे।

जय हिन्द !


हरि प्रताप सिंह राठोड़
अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक
जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
मुख्य प्रवर्तक
भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान
9536162424

( सभी सूचना व सामाजिक कार्यकर्ता यह नौ अपेक्षाएं माई ग्रीवांस पोर्टल व ट्विटर के माध्यम से प्रधानमंत्री जी को प्रेषित करें। )

Sunday, 21 May 2023

चुनाव हार गए लेकिन गलत सिफारिश नहीं की।

चुनाव हार गए लेकिन गलत सिफारिश नहीं की।

विपक्षी नेता भी करते थे सम्मान।

श्रद्धांजलि सभा में पप्पू भईया का भावपूर्ण स्मरण।

क्षत्रिय महासभा बदायूं के तत्वावधान में नेकपुर स्थित क्षत्रिय भवन में पूर्व विधायक अवनीश कुमार सिंह "पप्पू भईया" के निधन पर एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उपस्थित जनों ने स्व पप्पू भईया के जीवन से संबंधित संस्मरण साझा किए। दो मिनट के मौन के पश्चात सभा विसर्जित हुई।

इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए महाराणा प्रताप विकास ट्रस्ट के अध्यक्ष हरि प्रताप सिंह राठोड़ एडवोकेट ने कहा कि पप्पू भईया दातागंज विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक रहे, सत्ता पक्ष में भी रहे और विपक्ष में भी रहे। उन्होने कभी गलत सिफारिश नहीं की। चुनाव में पराजित होना स्वीकार किया लेकिन गलत कार्यों को समर्थन नहीं किया।

क्षत्रिय महासभा उत्तर प्रदेश के प्रदेश कोषाध्यक्ष डॉ सुशील कुमार सिंह ने कहा कि उनकी ईमानदारी और सादगी के कारण विपक्षी दलों के नेता भी उनका सम्मान करते थे।

क्षत्रिय महासभा बदायूं के संरक्षक मंडल के सदस्य डॉ वी पी सिंह सोलंकी ने कहा कि पप्पू भईया ने राजनीति में उच्च आदर्श स्थापित किए हैं, उनकी परम्परा के नेता अब किसी भी राजनैतिक दल में नहीं है।

क्षत्रिय महासभा बदायूं के जिला अध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा कि पप्पू भईया ने हमारे समाज मे जन्म लेकर हम सबको गौरवान्वित किया है। बर्ष २०२३ मे आयोजित होने वाला शस्त्र पूजन समारोह पप्पू भईया को समर्पित रहेगा।

पप्पू भईया के अति निकटस्थ व वरिष्ठ भाजपा नेता राणा प्रताप सिंह ने कहा कि पप्पू भईया चार बार विधायक रहे, लेकिन उनके पास एक जीप ही थी जिसे वे स्वयं ही चलाते थे। बस से यात्रा करते थे। वर्तमान समय में सामान्य कार्यकर्ता भी बस से यात्रा नही करते हैं।

इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष अखिलेश चौहान, जिला महासचिव रतनवीर सिंह तोमर, जिला अध्यक्ष कृषक सभा मनोज तोमर, जिला संयोजक व्यापार सभा राकेश सिंह, जिला संगठन मंत्री भूराज सिंह, जिला सचिव अभिषेक पुंडीर, नगर अध्यक्ष महीपाल सिंह, नगर उपाध्यक्ष राजपाल सिंह राठौड़, क्षत्रिय समाज विकास समिति के अध्यक्ष सुरेश सिंह सिसौदिया,  नगर सचिव मनोज चंदेल, रंजीत सिंह आदि उपस्थित रहे।

Wednesday, 3 May 2023

किराए के ई ओ और अभियंता नही बना सकते स्मार्ट सिटी।

मुख्य चुनावी मुद्दे जिन पर चर्चा ही नहीं होती।
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इस समय नगर निकाय का चुनाव चल रहा है, प्रथम चरण का चुनाव प्रचार थम गया है। राजनैतिक दल उन मुद्दों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके बल पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव लडे गए, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की भी चर्चा हो रही है।

"" स्मार्ट सिटी "" शब्द एक दशक से चलन में हैं। स्मार्ट सिटी के मूलभूत अंग - सड़के,  सड़को के बीच में डिवाइडर, ओवर ब्रिज/ फ्लाई ओवर, सीवर लाइन, रसोई गैस पाइप लाइन, भूमिगत विद्युतीकरण, बाईपास जैसी ऐसी योजनाएं जिनमे बड़ा बजट खर्च हो, को माना गया है। जब नगर निकाय को चुंगी कहते थे, "स्मार्ट सिटी"  जैसे शब्द की व्याख्या करने की सामर्थ्य नागरिकों में नहीं थी तब चुंगी के स्कूल कालेज होते थे, चुंगी के अस्पताल होते थे।

निकाय चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा पानी, सफाई, सड़के यहां तक कि जलकर और गृहकर में छूट देने की बात कही जा रही है, कोइ भी प्रत्याशी अथवा राजनैतिक दल स्कूल/ कालेज, अस्पताल बनाने की बात नहीं कर रहे हैं।

लेकिन निकाय चुनाव में पानी, सफाई और सड़क प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं। इनसे आगे नागरिक सोच नहीं पा रहे हैं या सोचने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। इनसे हटकर कुछ ऐसे भी विषय है जो चुनावी मुद्दे बन सकते हैं :-

१- नगर निकाय और पंचायत मतदाता सूची में सम्मिलित मतदाताओं की संख्या और विधान सभा की मतदाता सूची में सम्मिलित मतदाताओं की संख्या बराबर होनी चाहिए।
किंतु दोनो मतदाता सूची में सम्मिलित मतदाताओं की संख्या समान नहीं है। बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता हैं जिनके नाम पंचायत और नगर निकाय की दोनो ही मतदाता सूची में सम्मिलित हैं। 

२- अनेक गांव, नगर पंचायतों और नगर पालिका परिषदों की सीमा से चिपटे हुए हैं उन्हें नगर पंचायतों और नगर पालिका परिषदों में सम्मिलित किया जाए।

३- ऐसी ग्राम पंचायत जहां ब्लाक मुख्यालय और थाना मुख्यालय स्थित है, उन ग्राम पंचायत को नगर पंचायत का दर्जा मिले। 

४- उत्तर प्रदेश में नगरों में नई निर्मित होने वाली सड़कों, नालियों, नालों व पुलियों की ऊंचाई दोष पूर्ण नीतियों के कारण निरन्तर बढ़ाई जा रही है, जिस कारण घर नीचे होते जा रहे हैं, नाले और नालियों का गंदा पानी घरों में घुसता है। इस समस्या के समाधान के लिए गृह स्वामी घर तोड़कर पुन: निर्माण कराएं,  किंतु उसकी इतनी सामर्थ्य नहीं है। इस समस्या के समाधान के लिए अब तक किसी दल या जन प्रतिनिधि द्वारा प्रभावित नागरिकों की सहायतार्थ विशेष कोश बनाएं जानें की मांग कभी नहीं उठाई गई, विशेष कोष का गठन कर प्रभावित नागरिकों को मुआवजा दिए जानें की व्यवस्था हो।

५- नगर निकायों में अधिशासी अधिकारी नहीं है, अभियंता नही है। अन्य विभागों के अधिकारी अधिशासी अधिकारी का कार्य कर रहे हैं। अन्य कार्मिकों के पद भी बड़ी संख्या में रिक्त हैं ऐसी स्थिति में स्मार्ट सिटी की कल्पना व्यर्थ है।

६- नगर निकायों में कार्यरत सफाई कर्मचारी बड़ी संख्या में जन प्रतिनिधियों/अधिकारियों के कार्यालय/आवास पर सेवाएं दे रहे हैं, जो गंदगी का सबसे बड़ा कारण है।

७- अनेक नगर पंचायत/नगर पालिका परिषद में डिग्री कालेज नही है, अस्पताल नहीं है। प्रत्येक नगर पंचायत/नगर पालिका परिषद मे डिग्री कालेज के साथ ही कम से कम पचास शैय्या युक्त अस्पताल हो।

#हरि प्रताप सिंह राठोड़
अधिवक्ता
अध्यक्ष/ संस्थापक
जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
९५३६१६२४२४

Monday, 1 May 2023

दस लाख से अधिक अधिवक्ता लिपिकों के परिवारों की चिंता करे केंद्र/राज्य सरकार।

विश्व श्रमिक दिवस पर विशेष:-
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दस लाख से अधिक अधिवक्ता लिपिकों के परिवारों की चिंता करे केंद्र/ राज्य सरकार।
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देश में दस लाख से अधिक वकील हैं, इतने ही उनके क्लर्क है, टायपिस्ट हैं। दस लाख से अधिक परिवारों के मुखिया अधिवक्ता लिपिक हैं। तहसील न्यायालय, जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय सहित जहां भी अधिवक्ता विधि व्यवसाय कर रहे हैं, वहां उनके साथ लिपिक भी है। अधिवक्ता लिपिक को विधिक मान्यता प्राप्त है, उनका विधिवत पंजीकरण किया जाता है, समय समय पर नवीनीकरण भी होता है। किंतु दुर्भाग्य का विषय है कि इनकी ओर आज तक किसी भी राजनैतिक दल, जन प्रतिनिधि व केन्द्र/ राज्य सरकार की दृष्टि नहीं पड़ी, इनके कल्याण के लिए कोइ योजना नहीं बनाई गई।

आज विश्व श्रमिक दिवस है। सम्पूर्ण विश्व में श्रमिकों को लेकर श्रमिक संगठन विचार विमर्श करेंगे, श्रमिक हितार्थ अनेक मुद्दों पर चर्चा होगी। किंतु अधिवक्ता लिपिक कभी भी श्रमिक दिवस पर होने वाली चर्चाओ का हिस्सा नहीं बन सकें। अधिवक्ता लिपिक न्याय तन्त्र का ही अंग है। ये श्रमिक की तरह कठोर परिश्रम करते हैं, श्रमिक का कार्य करने का समय निर्धारित है, लेकिन इनका कार्य करने का समय निर्धारित नहीं है, और निर्धारित किया भी नहीं जा सकता है।

श्रमिकों के कल्याण हेतु संचालित योजनाओं से अधिवक्ता लिपिकों को भी आच्छादित किया जाना आवश्यक है। श्रम कानूनों के तहत इनका भी पंजीकरण अनिवार्य किया जाए। अधिवक्ता लिपिकों को चिकित्सा, शिक्षा, बीमा, आवास योजनाओं का लाभ प्रदान किया जावे। अधिवक्ता लिपिकों की पुत्रियों के विवाह हेतु सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करे। 

जय हिंद !

हरि प्रताप सिंह राठोड़
अधिवक्ता
अध्यक्ष/संस्थापक
जन दृष्टि (व्यवस्था सुधार मिशन)
9539162424

Thursday, 15 December 2022

तंत्र की विफलता के कारण अधिक मूल्य पर यूरिया खरीदने को किसान विवश।

व्यापारियों की पीड़ा सरकार तक पहुंचाने वाले अन्नदाता की पीड़ा पर मौन क्यों ?

किसान को वर्ष में दो से तीन बार डी ए पी की जरूरत पड़ती है, चार से छह बार यूरिया की आवश्यकता होती है। डी ए पी और यूरिया का उत्पादन वर्ष भर होता है। फिर भी किसान को जब जब डी ए पी और यूरिया की आवश्यकता पड़ती है तभी किल्लत पैदा हो जाती है या पैदा कर दी जाती है। सरकार की ओर से बयान जारी किए जाते हैं कि यूरिया और डी ए पी की कोइ समस्या नहीं है।

यदि किसान को प्रतिदिन उर्वरक की आवश्यकता होती, सप्ताह में एक बार उर्वरक की आवश्यकता होती, माह में एक बार उर्वरक की आवश्यकता होती तब तो किसान दम ही तोड़ देता। यह सही है कि उर्वरक की देश में कोई कमी नहीं है, किंतु तंत्र की विफलता, जिम्मेदारों का जमाखोरों और बिचौलियो को संरक्षण के कारण कृत्रिम किल्लत पैदा कर किसानों को शोषित, अपमानित और तिरस्कृत होने को छोड़ दिया जाता है।

किसान अधिक मूल्य पर यूरिया खरीद रहा है, मिलावटी यूरिया खरीद रहा है, नकली यूरिया खरीद रहा है। विरोध करता है तो व्यापारी अपमानित करता है, उर्वरक देने से मना भी कर देता है। अपमानित होकर अधिक मूल्य देकर बेचारा किसान उर्वरक खरीदने को विवश रहता है।

किसान शिकायत करता है, उसकी शिकायत को सुने कौन, किसानों से संबंधित विभागों में अफसरों का टोटा है। ब्लाक स्तरीय अधिकारी नहीं, तहसील स्तरीय अधिकारी भी नहीं यहां तक कि मंडल स्तरीय अधिकारी भी नहीं है। एक एक अधिकारी तीन तीन प्रभार संभाल रहा है। जो अधिकारी हैं भी उन्हे विभागीय बैठकों, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से फुर्सत ही नहीं है, इसलिए किसान की कौन सुने।

जन प्रतिनिधि और राजनैतिक दलों के पदाधिकारी भी किसान की समस्या से परिचित नहीं है, यदि परिचित हैं तो उनका मौन समझ से परे है।

हां सरकार किसान की आमदनी दो गुना करने को संकल्पबद्ध है, बिना तंत्र के किसान की आमदनी दो गुनी कैसे होगी, यह विचारणीय विषय है।

किसान रोजाना लुट रहा है, अधिक मूल्य पर यूरिया खरीद रहा है, मिलावटी और नकली यूरिया खरीदने को विवश है, मीडिया द्वारा उसकी आवाज को उठाया भी जाता है, फिर भी सरकार जिस तरह से जी एस टी टीम के छापों के विरुद्ध व्यापारियों के दबाव में बैकफुट पर आई उस तरह किसानों के लिए उदार नहीं दिखी, शायद किसान व्यापारियों की तरह आवाज नही उठा पाए, हमेशा की तरह कराह कर रह गए।