दोहे
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राजनीति में हो रहे प्रति- पल नये प्रपंच।
सच्चाई को फिर मिले कैसे कोई मंच?
जटिल समस्या हो गई,कैसे हो उपचार?
लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा रही सरकार।।
कल तक जिनसे बैर था,आज उन्हीं से मेल।
इसको ही कहते यहाँ राजनीति का खेल।।
महँगाई की मार से जनता है बदहाल।
ऊपर-नीचे हो रही सूचकांक की चाल।।
इतना ऊँचा हो गया महँगाई का ग्राफ।
मध्यम श्रेणी व्यक्ति की ज़ेब हो गई साफ।।
गोदामों में क़ैद है सेठों के सब माल।
जानबूझकर बुन रहे महँगाई का जाल।।
पाँच सितारा होटलों में होती है शाम।
रूप-सुधा के पी रहे,मंत्री जी अब जाम।।
जनता की चिन्ता किसे?हो कोई सरकार।
जनसेवा के नाम पर करते सब व्यापार।।
धनी और भी हो रहे यहाँ और धनवान।
निर्धन की तो खो गई बची-खुची पहचान।।
मत पूछो अब किस तरह पेट रहे हैं पाल।
सब कुछ महँगा हो गया ,सब्ज़ी,आटा-दाल।।
# कुमार आशीष(एड.)
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