Friday, 9 April 2021

दूषित मतदाता सूची से सम्भव नहीं है पारदर्शी व निष्पक्ष चुनाव।

विधानसभा व पंचायतों की मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या में बड़ा अंतर जांच का विषय।
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नगर निकायों के चुनाव में असफल या पसंदीदा पार्टी से टिकट पाने से वंचित प्रत्याशियों के पंचायत चुनाव लडने पर रोक क्यो नहीं?
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पंचायतों के वास्तविक निवासियों को ही हो चुनाव लड़ने का अधिकार, कृत्रिम निवासियों के चुनाव लड़ने पर लगे रोक।
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भारत निर्वाचन आयोग द्वारा निर्मित मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और दोषरहित कहा जा सकता है क्योंकि वह फोटोयुक्त है, आधार कार्ड से लिंक है, ऑनलाइन है, प्रत्येक मतदाता को पहचान पत्र निर्गत किया गया है।

भारत निर्वाचन आयोग ने अनेक बार राज्यों से आग्रह भी किया है कि वे पंचायत चुनाव और स्थानीय निकाय के चुनाव उसकी मतदाता सूची से करावें, जिससे भारी धन का व्यय रुकेगा। किन्तु राज्य तैयार नहीं हुए।

व्यहारत: उत्तर प्रदेश की भारत निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची में अंकित मतदाताओं की संख्या व राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा निर्मित ग्राम पंचायतों व नगर निकायों(नगर पंचायत/नगरपालिका परिषद/नगर निगम)  की मतदाता सूची में अंकित मतदाताओं की संख्या बराबर होनी चाहिए। किन्तु ऐसा नहीं है ।

राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा ग्राम पंचायतों की जो मतदाता सूची तैयार की गई है उसमें ऐसे अनेक मतदाताओं के नाम सम्मिलित हैं जो नगर निकायों की मतदाता सूची में भी सम्मिलित हैं, अनेक मतदाताओं के नाम एक से अधिक ग्राम पंचायतों की मतदाता सूची में अंकित है,अवयस्कों के नाम भी सम्मिलित हैं।

यही स्थिति नगर निकायों की मतदाता सूची की भी है, उसमें अनेक ऐसे मतदाताओं के नाम अंकित है, जो किसी न किसी ग्राम पंचायत के मतदाता हैं।

 इस प्रकार देखा जाए तो भारत निर्वाचन आयोग द्वारा निर्मित मतदाता सूची में अंकित उत्तर प्रदेश के समस्त मतदाताओं की संख्या से राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा निर्मित ग्राम पंचायतों व नगर निकायों की मतदाता सूची में लगभग तीस प्रतिशत मतदाता अधिक हैं।

सबसे चौकाने वाली बात यह है कि हम एक देश एक चुनाव की बात करते हैं, किन्तु कभी यह विचार क्यो नहीं होता है कि पंचायत और नगर निकायों के चुनाव एक साथ कराए जावे। एक साथ चुनाव न कराने के दुष्प्रभाव यह है कि पंचायत चुनाव में असफल प्रत्याशी नगर निकायों के चुनावों में ताल ठोक देते हैं, और नगर निकायों में असफल प्रत्याशी पंचायत चुनाव में भाग्य आजमाते हैं।

वर्तमान पंचायत चुनाव में बड़ी संख्या में ऐसे प्रत्याशी है जो वर्ष 2017 के नगर निकायों के चुनाव में अपना भाग्य आजमा चुके हैं, जिनके नाम नगर निकायों की मतदाता सूची में अंकित है, जो नगर निकायों के चुनाव में सफल नहीं हो सके अथवा प्रयासों के उपरांत वे पसंदीदा पार्टी का टिकट नहीं पा सके  ।

ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने की अनुमति देना सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया को दूषित बनाता है साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश की स्वायत्तता पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े करता है।

पंचायते ऐसे प्रतिनिधियों के हाथों में हो जो वास्तव मे परिवार सहित गांव में ही निवास करते हों, ऐसे व्यक्ति जो परिवार सहित गांव में जीवन व्यतीत नहीं कर सकते, वे भला पंचायतों के हितचिंतक कैसे हो सकते हैं ?

एक देश - एक चुनाव के साथ ही एक चुनाव आयोग और एक मतदाता सूची के मुद्दे पर भी बहस की आवश्यकता है ।

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