---- गीत ---
--- आंदोलित नारी शक्ति ---
बहुत हो चुका चूल्हा चकिया, सहकारी परिवार चाहिए !
हाड़-मांस की मै भी पुतली, मुझको भी रविवार चाहिए !!
सात रंग से बनी रंगोली, केंद्र बिन्दु में मै रहती हूँ ,
सबकी मांगे पूरी करने , दिन भर झरने सी बहती हूँ !
कर्तव्यों को खूब निभाया, अब मुझको अधिकार चाहिए !!
सूरज के संग मै उठ जाती , तारों के संग सो जाती हूँ,
सबके सुख की चिन्ता में मै, हर पल चिन्तित हो जाती हूँ !
पर हफ्ते में एक दिवस अब, गरम चाय अखबार चाहिए !!
ना मै कोई जिन्न-देवता , ना मै जादू भरी पिटारी ,
पर सब मुझसे यही चाहते , मांगे पूरी होवे सारी !
अब से ऐसा नहीं चलेगा , बराबरी का भार चाहिए !!
हाँ, मै माँ हूँ , पत्नी भी हूँ , तुम भी तो बेटे या पति हो,
प्यार तुम्हारा क्या यह कहता, केवल मेरी ही दुर्गति हो !
कार्य घरेलू सात-एक में ,बांटो ,ना तकरार चाहिए !!
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