नागरिक हितों की अनदेखी है 17 जुलाई 2020 को लोक भवन के सामने घटित घटना।
हर जनपद मेंं बढ़ी संख्या में है ऐसे पीड़ित नागरिक।
जन शिकायत निवारण तंत्र का पूरी तरह अभाव है। जो तन्त्र बनाया भी गया उसे भ्रष्ट तत्वों ने दुर्बल कर दिया तथा बाबुओं के हाथ में सौंप दिया। अधिकांश विभागों में तो शिकायत निस्तारण का प्रारूप बना लिया गया है और उन्हें पहले से ही पता रहता है कि क्या आख्या देनी है।
निचले स्तर पर नागरिकों की समस्या का समाधान नहीं होता है बल्कि आर्थिक शोषण अवश्य हो जाता है और वह भी दोनों ही पक्ष का ......।
तब थक हार कर साहस जुटाकर नागरिक अपनी शिकायत लेकर उच्च अधिकारियों के पास जाता है।जिस अधिकारी से मिलने की आस लेकर गया है, आवश्यक नहीं कि वह अधिकारी उसे मिल ही जाये।
यदि सौभाग्य से मिल भी गया तो वह उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थ को आदेशित करता है ( यह वही अधीनस्थ होता है जिसके द्वारा नागरिक की शिकायत पर कोई रुचि नहीं दिखाई गई )
आदेश देखें -
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# आवश्यक कार्यवाही करें।
# उचित कार्यवाही करें।
# यथोचित कार्यवाही करें।
"आवश्यक" "उचित" और "यथोचित" क्या है? , इसका ही ज्ञान उस आदेश कर्ता अधिकारी को भी नहीं है। यदि ज्ञान होता तो वह स्पष्ट आदेश पारित करता।ऐसी स्थिति में यह कैसे मान लिया जाए कि अधीनस्थ अधिकारी को "आवश्यक" "उचित" और "यथोचित" कार्यवाही का ज्ञान होगा।
"आवश्यक" "उचित" और "यथोचित" कार्यवाही के आदेश के साथ शिकायत पत्र उसी अधीनस्थ अधिकारी के पास पहुंचता है, जिसने ज्ञात अज्ञात कारणों से शिकायत के निस्तारण में रुचि नहीं दिखाई।
वह अधीनस्थ अधिकारी शिकायत कर्ता को डांटता है, अभद्रता करता है, उच्च अधिकारी जिसके द्वारा "आवश्यक" "उचित" और "यथोचित" कार्यवाही का आदेश दिया गया है, उसके सम्मान में भी कुछ कहता है।
अन्तत: शिकायतकर्ता थक हार कर अपने भाग्य-दुर्भाग्य व व्यवस्था को कोसता हुआ निराश और हताश होकर घर बैठ जाता है।
आदेश कर्ता अधिकारी को भी अपने द्वारा "आवश्यक" "उचित" और "यथोचित" कार्यवाही के आदेशों की मानीटरिग करने की फुर्सत नहीं है।
यही कार्य प्रणाली ऐसी शर्मनाक घटनाओं को जन्म देती है जो 17 जुलाई 2020 को लोक भवन के सामने लखनऊ में घटित हुई।
हर जनपद में ऐसी समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है। लेकिन दृष्टि होते हुए भी ये समस्याए दिखाई नहीं देती है।या जानबूझकर हम ऐसी समस्याओं की ओर दृष्टि ही नहीं डालते।