3. वन-विभाग (अंतिम भाग 5- अगस्त 29 की पोस्ट के आगे)
आंकड़ों का महाखेल- वृक्षारोपण
वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण शासन का वार्षिक कार्यक्रम है। इमरजेंसी में संजय गांधी द्वारा चलाये गये वृक्षारोपण अभियान के पश्चात हर वर्ष बिला नागा प्रत्येक जनपद में लाखों वृक्ष लगाये जाते हैं- कुछ ज़मीन पर और ज़्यादा काग़ज़ पर। पर दोनो में एक बात कामन होती है – वृक्षों को पानी किसी में नहीं दिया जाता है जिससे ज़मीन पर लगाये वृक्ष सूख जायें और अगले वर्ष वृक्षारोपण हेतु ज़मीन उपलब्ध रहे, तथा कागज़ पर लगाये गये वृक्षों का आंकड़ा कभी भी निरीक्षण हेतु यथावत कड़क रहे। इससे पिछले वर्षों में अरबों पेड़ ‘लग जाने’ के बाद भी पेड़ लगाने हेतु भूमि वर्षानुवर्ष यथापूर्व खाली मिल जाती है। वृक्षारोपण कार्यक्रम वन विभाग एवं सामान्य प्रशासन विभाग के लिये हर वर्ष एक उत्सव जैसा होता है क्योंकि इसमें रोपित दिखाये गये वृक्षों के सीधे अनुपात में सम्बंधित अधिकारियों पर लक्ष्मी कृपालु होतीं हैं। वर्ष 2010 से वृक्षारोपण के आंकड़ों में एक महाखेल और प्रारम्भ हुआ है। उस वर्ष वन विभाग को 5 करोड़ वृक्ष लगाये जाने का टार्गेट दिया गया था। इस हेतु ज़मीन हो न हो और इतने पौधे हों न हों, टार्गेट को पूरा होना था, सो हुआ। उसकी पूर्ति की रिपोर्ट शासन में पहुंचते ही देश-विदेश के समाचार पत्रों में हंगामा मच गया कि उत्तर प्रदेश के वन-विभाग ने एक बरसात में 5 करोड़ वृक्ष लगाकर विश्व रिकार्ड कायम किया है। उ. प्र. के अधिकारियों को लंदन में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल गया। तब से रिकार्ड तोड़ने की होड़ लग गई है और प्रति वर्ष यह रिकार्ड टूट रहा है। इस वर्ष तो एक दिन में ही 25 करोड़ वृक्ष लग जाने का समाचार छपा है। मैं आशा कर रहा हूं कि इतने महान कार्य पर तो अंतर्राष्ट्रीय के बजाय कोई अंतर्ग्रहीय पुरस्कार मिलना चाहिये।
इतनी महती सफलता की बात पढ़कर मेरा मन रोमांचित हुआ था। जब मैं रोमांचित होता हूं तो मेरा गणित का पुराना शौक जाग जाता है। मैने हिसाब लगाया कि उत्तर प्रदेश में कुल 58909 ग्राम पंचायत हैं। सुविधा हेतु इस संख्या को 60000 मान लिया जाये, तो वृक्षारोपण अभियान के दिन प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में यदि 4000 वृक्ष लगाये गये हों, तो 24 करोड़ लग पायेंगे। शेष 1 करोड़ छोटे-बड़े नगरों में लगाया जाना मान लेता हूं। मैने अपने ग्राम एवं अन्य आस-पास के गावों में लगाये गए वृक्षों के विषय में पूछताछ की, तो किसी गांव में सौ-पचास वृक्ष से अधिक लगाये जाने की पुष्टि नहीं हुई। अब आगे मुझे हिसाब बताने की आवश्यकता नहीं है कि कितने वृक्ष ज़मीन पर लगे होंगे और कितने कागज़ पर।
वृक्षारोपण के आंकड़ों का यह महाखेल तो साल-दर-साल चलता है। कभी कोई यह नहीं पूछता है कि गत वर्षों के वृक्ष किस ज़मीन पर लगते रहे हैं और हर वर्ष कहां ज़मीदोज़ हो जाते रहे हैं। नये लगाये जाने वाले वृक्षों की संख्या बढ़ाने के बजाय यदि प्रशासन पहले लगाये गये वृक्षों को जीवित रखने पर ज़ोर दे, तो वनाच्छादित क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है। परंतु यह कार्य कोई क्यों करे जब कि यह कार्य दुरूह है, त्वरित लक्ष्मी-कृपा का साधन नहीं है और इस कार्य में अंतर्राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की सम्भावना नगण्य है।