Monday, 31 August 2020

आंकड़ों का महाखेल - वृक्षारोपण ( पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी की फेसबुक वॉल से साभार ।)

3. वन-विभाग (अंतिम भाग 5- अगस्त 29 की पोस्ट के आगे)

आंकड़ों का महाखेल- वृक्षारोपण 

         वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण शासन का वार्षिक कार्यक्रम है। इमरजेंसी में संजय गांधी द्वारा चलाये गये वृक्षारोपण अभियान के पश्चात हर वर्ष बिला नागा प्रत्येक जनपद में लाखों वृक्ष लगाये जाते हैं- कुछ ज़मीन पर और ज़्यादा काग़ज़ पर। पर दोनो में एक बात कामन होती है – वृक्षों को पानी किसी में नहीं दिया जाता है जिससे ज़मीन पर लगाये वृक्ष सूख जायें और अगले वर्ष वृक्षारोपण हेतु ज़मीन उपलब्ध रहे, तथा कागज़ पर लगाये गये वृक्षों का आंकड़ा कभी भी निरीक्षण हेतु यथावत कड़क रहे। इससे पिछले वर्षों में अरबों पेड़ ‘लग जाने’ के बाद भी पेड़ लगाने हेतु भूमि वर्षानुवर्ष यथापूर्व खाली मिल जाती है। वृक्षारोपण कार्यक्रम वन विभाग एवं सामान्य प्रशासन विभाग के लिये हर वर्ष एक उत्सव जैसा होता है क्योंकि इसमें रोपित दिखाये गये वृक्षों के सीधे अनुपात में सम्बंधित अधिकारियों पर लक्ष्मी कृपालु होतीं हैं। वर्ष 2010 से वृक्षारोपण के आंकड़ों में एक महाखेल और प्रारम्भ हुआ है। उस वर्ष वन विभाग को 5 करोड़ वृक्ष लगाये जाने का टार्गेट दिया गया था। इस हेतु ज़मीन हो न हो और इतने पौधे हों न हों, टार्गेट को पूरा होना था, सो हुआ। उसकी पूर्ति की रिपोर्ट शासन में पहुंचते ही देश-विदेश के समाचार पत्रों में हंगामा मच गया कि उत्तर प्रदेश के वन-विभाग ने एक बरसात में 5 करोड़ वृक्ष लगाकर विश्व रिकार्ड कायम किया है। उ. प्र. के अधिकारियों को लंदन में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल गया। तब से रिकार्ड तोड़ने की होड़ लग गई है और प्रति वर्ष यह रिकार्ड टूट रहा है। इस वर्ष तो एक दिन में ही 25 करोड़ वृक्ष लग जाने का समाचार छपा है। मैं आशा कर रहा हूं कि इतने महान कार्य पर तो अंतर्राष्ट्रीय के बजाय कोई अंतर्ग्रहीय पुरस्कार मिलना चाहिये।          
                 इतनी महती सफलता की बात पढ़कर मेरा मन रोमांचित हुआ था। जब मैं रोमांचित होता हूं तो मेरा गणित का पुराना शौक जाग जाता है। मैने हिसाब लगाया कि उत्तर प्रदेश में कुल 58909 ग्राम पंचायत हैं। सुविधा हेतु इस संख्या को 60000 मान लिया जाये, तो वृक्षारोपण अभियान के दिन प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में यदि 4000 वृक्ष लगाये गये हों, तो 24 करोड़ लग पायेंगे। शेष 1 करोड़ छोटे-बड़े नगरों में लगाया जाना मान लेता हूं। मैने अपने ग्राम एवं अन्य आस-पास के गावों में लगाये गए वृक्षों के विषय में पूछताछ की, तो किसी गांव में सौ-पचास वृक्ष से अधिक लगाये जाने की पुष्टि नहीं हुई। अब आगे मुझे हिसाब बताने की आवश्यकता नहीं है कि कितने वृक्ष ज़मीन पर लगे होंगे और कितने कागज़ पर। 
                वृक्षारोपण के आंकड़ों का यह महाखेल तो साल-दर-साल चलता है। कभी कोई यह नहीं पूछता है कि गत वर्षों के वृक्ष किस ज़मीन पर लगते रहे हैं और हर वर्ष कहां ज़मीदोज़ हो जाते रहे हैं। नये लगाये जाने वाले वृक्षों की संख्या बढ़ाने के बजाय यदि प्रशासन पहले लगाये गये वृक्षों को जीवित रखने पर ज़ोर दे, तो वनाच्छादित क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है। परंतु यह कार्य कोई क्यों करे जब कि यह कार्य दुरूह है, त्वरित लक्ष्मी-कृपा का साधन नहीं है और इस कार्य में अंतर्राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की सम्भावना नगण्य है।

Friday, 28 August 2020

आंकड़ों का खेल (पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी की फेसबुक वॉल से साभार।)

आंकड़ों का खेल- (भाग 4- अगस्त 27 की पोस्ट स आगे)

सामान्य  प्रशासन विभाग-

ब. मेलों में ‘पुण्यार्जन’  
 
            यह सर्वविदित है कि मेले और विशेषकर कुम्भ जनसामान्य के लिये बड़े पुण्यार्जन के अवसर होते हैं।  जिस प्रकार ईसाइयों द्वारा संडे को चर्च जाकर पादरी के समक्ष पिछले सप्ताह भर के पापों को स्वीकार लेने पर हफ़्ते भर के पाप नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार हिंदुओं के पिछले सभी पाप मेलों के अवसर पर गंगा मैया में स्नान करने से धुल जाते  हैं। परंतु यह बात सर्वविदित नहीं है कि कतिपय विभागों के कर्मियों (मुख्यतः सामान्य प्रशासन विभाग के)  के लिये ये मेले   पुण्यार्जन से कहीं अधिक नोटार्जन के अवसर होते हैं। चूंकि अर्जित नोटों का परिमाण उतना ही बड़ा होता है जितना मेला प्रबंध पर हुआ व्यय काग़ज़ों पर दिखाया जाता है, अत: प्रशासन को 'मजबूरन' आने वाले यात्रियों के आंकड़े दस-बीस गुना बढ़ाकर दिखाने पड़ते हैं।   

              वर्ष 1974 में हरिद्वार में कुम्भ मेला आयोजित था। तब मैं पुलिस अधीक्षक, सहारनपुर नियुक्त था। यद्यपि हरिद्वार उस समय जनपद सहारनपुर का अंग था, तथापि कुम्भ मेला क्षेत्र को अलग जनपद घोषित कर दिया गया था और उसके लिये अलग एक अनुभवी पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की गई थी। जहां तक मुझे याद है मेला के उपरांत डी. एम./एस. पी., कुम्भ मेला ने लगभग 12 लाख यात्रियों के आने की सूचना शासन को भेजी थी। उस वायरलेस की प्रतिलिपि जब मुझे प्राप्त हुई, तब मेरा गणित का विद्यार्थी जीवन का शौक जाग गया था। मैने हरिद्वार आने वाली समस्त ट्रेनो, बसों, स्पेशल बसों, कारों, स्कूटरों, रिक्शों, बुग्गियों में और पैदल आने वाले यात्रियों का खूब बढ़ा चढ़ा कर योग लगाया, तो भी आंकड़ा किसी प्रकार दो लाख से आगे नहीं बढ़ सका था। एस. पी, कुम्भ मेला से मुलाकात होने पर मैने अनौपचारिक ढंग से यह विषय छेड़ा, तो अनुभवी एस. पी. बोले,

              “यह अनुमान केवल मेरा नहीं होता है, समस्त मेला प्रशासन का होता है। प्रशासन ने 10 लाख यात्रियों की व्यवस्था हेतु बजट स्वीकृत कराया था और पूरे का खर्च दिखाया है। अब दस लाख से कम यात्रियों का अनुमान कैसे दिया जा सकता है? यात्रियों का आंकड़ा अधिक होने पर प्रदेश शासन को प्रशंसा मिलेगी और भविष्य में केंद्र से अधिक अनुदान मांगने का अवसर भी।“

            अपने आगे के सेवाकाल में मैने अनुभव किया कि अनुभवी एस. पी. की बात में बड़ा दम था। तभी प्रत्येक आने वाले कुम्भ मेले में यात्रियों की संख्या का आंकड़ा ऐसी लम्बी छलांगें लगाता रहा है जैसी शेर द्वारा पीछा किये जाने पर हिरन छलांग लगाता है। मैने समाचार पढ़ा है कि वर्ष 2021 में  हरिद्वार में होने वाले कुम्भ मेला के लिये प्रशासन ने 12 करोड़ यात्रियों के आने का अनुमान दिया है। मैं जानता हूं कि मेले के अंत में प्रशासन का आंकड़ा इसके ऊपर ही जायेगा, जिसकी परिणति इसे मानव इतिहास में विश्व का सबसे बड़ा मेला घोषित होने,  शासन की विश्व भर में वाहवाही होने और अनेक व्यक्त्तियों को विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो जाने में होगी। 

                          पर मैं अपने गणित के पुराने शौक के लिये क्या करूं? वह जागृत हो गया है और मैने हिसाब लगाया है कि  भारत की आबादी लगभग 132 करोड़ है और उसका 1/11 वां भाग होता है 12 करोड़। इसका अर्थ हुआ कि मेरे 2200 आबादी वाले गांव से औसतन 200  (2200/11) लोग कुम्भ स्नान हेतु जाने चाहिये। मैने गांव से पता लगाया तो पाया कि पिछले वाले कुम्भ में तो 20 भी नहीं गये थे; मैं अचम्भित हूं कि इस बार एकदम भक्तिभाव में दस-बारह गुना वृद्धि कैसे हो जायेगी जो 200 चले जायेंगे?

                                                                                -क्रमशः

Thursday, 27 August 2020

अपराध: कानून व्यवस्था, लोक व्यवस्था । ( पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह की फेसबुक वॉल से साभार।)

*अपराध* - *कानून व्यवस्था* - *लोक व्यवस्था*
हमारे बहुत से मित्र, जिनमें पत्रकार मित्र भी शामिल हैं, अपराध स्थिति, लोक व्यवस्था और कानून व्यवस्था के बीच भ्रमित रहते हैं। अतः मैंने इसे सामाजिक, पुलिसिंग और विधिक दृष्टिकोण से स्पष्ट करना जरूरी समझा।

अपराध स्थिति (Crime control)- जब कोई अपराध एकल रूप से घटित होता है तो वह शुद्ध आपराधिक मामला होता है। अगर पेशेवर अपराधी बहुतायत में अपराध करें या पहले से स्थिति ज्ञात होने पर भी पुलिस कार्यवाही न करे या अधिकांश अज्ञात अपराध न खुल पायें, तो यह कहा जा सकता है कि उस क्षेत्र में अपराध स्थिति ठीक नहीं है और अपराध नियंत्रण में नहीं हैं। किन्तु इस आधार पर यह कहना गलत होगा कि उस क्षेत्र में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है या अनियंत्रित है।

कानून व्यवस्था (Law and Order)- इसके अन्तर्गत बलवा, दंगा, रोड जाम करना, सार्वजनिक स्थान पर हत्या/हमला, तोडफ़ोड़, किसी संस्थान/कार्यालय पर हमला, लोकसेवकों/व्यापारियों/व्यवसायियों से धन वसूली इत्यादि घटनाओं का अधिक होना और/या सख्त कार्यवाही न होना खराब कानून व्यवस्था का द्योतक है।

लोक व्यवस्था- जब अपराध या कानून व्यवस्था की ऐसी घटनाएं हों जिनसे समाज में भय और आतंक व्याप्त हो जाये या समाज का आम जीवनढर्रा (even tempo of life in society) अव्यवस्थित हो जाये तो ऐसी घटनाएं लोक व्यवस्था की घटनाएं कही जाती हैं। उदाहरण के लिए- कुछ अपराधी भीड़भाड़ वाले स्थान/बाजार में हत्या करते हैं और धमकी तथा चेतावनी देते हैं कि जो कोई इस केस में गवाही देगा या उनके आपराधिक कृत्यों में बाधक बनेगा, उसका यही हाल होगा। 
यदि किसी क्षेत्र में ऐसी घटनाएं नियंत्रित न हो पायें और सख्त वैधानिक कार्यवाही न की जाये तो यह मत बनता है कि उस क्षेत्र में लोक व्यवस्था नियंत्रण से बाहर हो गई है।

उम्मीद है कि इस व्याख्या से सही स्थिति और मापदंडों को समझने में सहायता मिलेगी।

नौकरशाही के भ्रष्टाचार और अन्याय पूर्ण कार्य और राजनैतिक दबाव।( पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह की फेसबुक वॉल से साभार।)

नौकरशाह कहते हैं कि बड़ा टेंशन है, बड़ा प्रेशर है, पर तैनाती जिले में ही चाहिये। अब तो वरिष्ठ सरकारी अधिकारी खुलकर कहते हैं कि मंत्री जी का या फलां फलां का दबाव था। वे अपने भ्रष्टाचार और अन्यायपूर्ण कार्यों के लिए राजनैतिक दबाव को सही और पर्याप्त औचित्य मानते हैं।

कथित ईमानदार अधिकारी भी राजनैतिक इशारे पर गलत काम करने या गलत रिपोर्ट बनाने को सही मानते हैं। श्री हरीशचंद्र गुप्ता, तत्कालीन कोयला सचिव इसी तरह गलत रिपोर्ट बनाने के कारण सजायाब हुये। आश्चर्य है कि नौकरशाही की पूरी लाबी उन्हें बचाने में ईमानदारी से लगी रही। आगे ऐसी अनहोनी न हो, इस उद्देश्य से नौकरशाही ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम को, जो वर्ष 1988 में सुदृढ़ प्रारूप में बनाया गया था, नख-दन्त विहीन कर दिया। दबाव और प्रलोभन में गलत रिपोर्ट बनाने और फर्मों को नाजायज लाभ पहुँचाना अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। और भी व्यापक और विस्तृत संसोधन करके भ्रष्टाचार के लिए सजा होने के सारे रास्ते बन्द कर दिये गए।

वरिष्ठ नौकरशाहों खासकर आई.ए.एस., आई.पी.एस. और प्रथम श्रेणी की सेवाओं के अधिकारियों द्वारा दबाव या तनाव की दलीलें औचित्यरहित एवं शरारतपूर्ण हैं। इस स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को दबाव/तनाव बर्दाश्त करने ही होंगे। इस विषय पर मुझे उत्तर प्रदेश संवर्ग के वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी श्री विजय शंकर पाण्डेय का कथन याद आ रहा है। वर्ष 2011 में वरिष्ठ अधिकारियों (डी.एम./एस.पी./कमिश्नर/डी.आई.जी./आई.जी.) की बैठक में कुछ अधिकारियों द्वारा इसी तरह दबाव/तनाव की दलीलें दी गईं। इस पर श्री विजय शंकर पाण्डेय, जो उस समय अपर कैबिनेट सचिव थे, ने कहा कि-

"ये सेवाएं कमजोर कलेजे वालों के लिए नहीं हैं। जो दबाव/तनाव नहीं झेल सकते, उन्हें दूसरी नौकरी ढूंढ़ लेनी चाहिए अथवा हल्की/शांतिपूर्ण पोस्ट पकड़ लेनी चाहिए"।

मैं यह बातें पुलिस अधिकारियों को ट्रेनिंग के दौरान हमेशा बताया करता था। मैं शोले फिल्म के एक डायलॉग के जरिये भी इस बात को समझाया करता था-
 "शोले में ठाकुर जब जय और वीरू से गब्बर सिंह को पकड़ने के लिए बीस हजार रुपये की बात कहता है तो वीरू कहता है कि गब्बर कोई बकरी का बच्चा है जो दौड़े और पकड़ लिया? इस पर ठाकुर कहता है, "जानता हूँ कि काम मुश्किल है लेकिन आसान काम के इतने पैसे नहीं दिये जाते"। मै प्रशिक्षु अधिकारियों को कहा करता था कि माना कि पुलिस का काम बहुत कठिन है पर याद रखिये कि आसान काम के लिए 'थानेदार या कप्तान' नहीं लगाये जाते।

जिला मैजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को प्रदत्त कानूनी शक्तियां, संसाधन और सुविधायें एवं कार्यभार अत्यंत वृहत और व्यापक होते हैं। इसकी तुलना बड़े-बड़े पदों से भी नहीं की जा सकती है। लिहाजा ये पदाधिकारी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं कर सकते। सरकार और सरकार के माध्यम से अन्ततः जनता यह उम्मीद करती है कि ये पद धारक दृढ़तापूर्वक कार्य करेंगे।

एक बात और मैं अपने तजुर्बे से कहूंगा कि सच्चे, ईमानदार और परिश्रमी अधिकारियों का कोई उत्पीड़न नहीं होता है। अधिकतर यह होता है कि उन्हें किनारे कर दिया जाता है। ठीक है, जो काम मिला है उसे मन लगाकर करिये और चैन से रहिये। इन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को उच्च वेतन, उच्च सुविधाएं, सभी संसाधन मिलते हैं। और सबसे ऊपर, इन अधिकारियों को नागरिक,  बहुत ज्यादा सम्मान देते हैं और विश्वास करते हैं। इसके बाद जनता की यह उम्मीद न्यायपूर्ण है कि ये अधिकारी इतना सब गरीब  जनता के पैसों से पाने के बाद कुछ असुविधायें बर्दाश्त करेंगे। यह सामान्य बात है कि कई अधिकारी ये असुविधायें बर्दाश्त नहीं कर सकते। तब ऐसे अधिकारियों को चाहिए कि वे शान्तिपूर्ण पोस्टिंग लेलें।

यह लिखने का मेरा उद्देश्य यह है कि आम नागरिक और प्रबुद्धजन, नौकरशाही के इन बहानों को स्वीकार न करें। ऐसे उच्च पदाधिकारियों के ये बहाने नहीं सुने/माने जाने चाहिए। ऐसे अधिकारियों को चाहिए कि वे शान्तिपूर्ण/सुरक्षित तैनाती पकड़ लें; बहुत से पद ऐसे हैं!

आंकड़ों का खेल ( पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी की फेसबुक वॉल से साभार।)

आंकड़ों का खेल (भाग 3- अगस्त 25 की पोस्ट के आगे)

2. सामान्य प्रशासन विभाग

अ. आंकड़े का चहुंदिश खेल-  

            यद्यपि सभी विभाग आंकड़ों का खेल खेलते हैं परंतु इनके समन्वयक होते हैं सामान्य प्रशासक अर्थात ज़िलाधिकारी, एस. डी. एम., सी. डी. ओ., तहसीलदार आदि। व्यवहारिक रूप में ये विभिन्न विभागों एवं शासन के बीच के बिचौलिये हैं। हम जानते ही हैं कि बिचौलिये न तो माल के उत्पादक होते हैं और न उपभोक्ता, परंतु माल सबसे अधिक वे ही काटते हैं। शराब, तेल, बंदूक, फ़ैक्ट्री, होटल, मेला, सर्कस, सिनेमा, पत्थर, मौरंग आदि किसी का लाइसेंस देना हो, या  बाढ़, सूखा, आग, दुर्घटना, कन्या शिक्षा, निर्धन विवाह, ओल्ड-एज पेंशन आदि किसी प्रकार का अनुदान देना हो अथवा मनरेगा, कौशल-विकास, मध्यान्ह-भोज, शिशु-सुरक्षा आदि किसी प्रकार के विकास की मद का पैसा आवंटित करना हो, गंगा बहेगी कलक्टर रूपी गोमुख से ही। अब यदि उस गंगा में कलक्टर आफ़िस के कर्मी डुबकी लगाकर अपने हक का पुण्य अर्जित कर लेते हैं, तो आपत्ति की क्या बात है?  इस गंगा स्नान का ‘पुण्य’ अनुदान को खर्च करने के आंकड़े के अनुपात में मिलता है। क्या आंकड़ों में खेल करने का यह पर्याप्त कारण नहीं है?    
               ग्रामीण विकास की अधिकांश योजनायें उन अधिकारियों द्वारा बनाई जाती हैं, जिहोंने पिकनिक के अवसर के अतिरिक्त ग्राम देखे ही नहीं होते हैं। अतः अधिकांश योजनायें कागज़ पर कार्यान्वित होतीं हैं, उदाहरणार्थ- 1. मेरे ग्राम की आंगनबाड़ी प्रभारी प्रति माह वेतन पातीं थीं, परंतु ग्वालियर में ब्याही थीं और वहीं ससुराल में रहती थीं। 2. एक छोटी सी पोखरी के अतिरिक्त मेरे गांव में ग्राम समाज की कोई ख़ाली ज़मीन ही नहीं है, जहां कोई काम किया जा सके, पर मनरेगा का कार्यक्रम वर्षानुवर्ष चल रहा है और ‘हक’ के अनुसार समस्त भागीदारों का नियमित भुगतान हो रहा है। 3. सरकारी स्कूल में बच्चों को मध्यान्ह भोज बच्चों के आंकड़ों के अनुसार बंट जाता है, चाहे बच्चे आयें या न आयें।
 
              योजनायें इतनी हैं कि अधिकांश अधिकारीगण उन सबके नाम भी नहीं गिना सकते हैं। पर इनके कार्यान्वन को सफल दर्शाने हेतु आंकड़ों का खेल करना उन बिचारों की मजबूरी होती है। और जब आंकड़े बनते हैं, तो अनुदान भी ‘खर्च’ होता ही है। 'खर्च' होकर कहां जाता है, इससे किसी को क्या मतलब?

-  क्रमशः

आंकड़ों का खेल (पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी की फेसबुक वॉल से साभार)

आंकड़ों का खेल (भाग-2- दि. 24 अगस्त की पोस्ट से आगे)

1. पुलिस विभाग
 
अ. अपराध नियंत्रण 
                पुलिस की दक्षता का मुख्य मापक अपराधों में कमी होता है। समयाभाव के कारण थाना का निरीक्षण करने वाले अधिकारी को अपराधों में वास्तविक कमी या बढ़ोत्तरी का ज्ञान हो पाना अत्यधिक दुरूह होता है| मजबूरन वह वर्तमान वर्ष के अपराध के आंकड़ों को विगत वर्ष के आंकड़ों से तुलना कर समीक्षा करता है। अतः अधिकांश थानेदारों का ध्यान अपराधों को कम रखने पर उतना नहीं रहता है, जितना अपराध के आंकड़ों को कम रखने पर रहता है। पुलिस के उच्चाधिकारी एवं शासक बात तो एफ़. आई. आर. अविलम्ब दर्ज़ किये जाने की कहते हैं, परंतु उनमें बहुत से मन ही मन आंकड़ा-नियंत्रण के खेल के पक्षधर होते हैं। आंकड़े कम रहने पर वे प्रेस एवं विपक्ष की आलोचना का डटकर सामना कर लेते हैं। वास्तविक स्थिति यह है कि बढ़ती आबादी, नये आपराधिक कानून एवं समाज की बदलती सोच के कारण अपराधों का बढ़ना स्वाभाविक है, परंतु कम शासक ही साहसपूर्वक यह बात कह पाते हैं। जनमानस भी इस तथ्य को अंगीकार नहीं करता है। उत्तर प्रदेश पुलिस के वर्ष 1970 के आई. जी. श्री एन. एस. सक्सेना ने घोषित कर दिया था कि उ. प्र. में वर्ष में केवल डेढ़ लाख अपराध ही दर्ज होते हैं जब कि लगभग 4 लाख संज्ञेय अपराध घटित होते हैं। उन्होंने भरसक प्रयत्न भी किया कि सभी अपराध पंजीकृत हों। परिणाम यह हुआ कि एक वर्ष में ही आई. जी. बदल दिये गये। इसके विरुद्ध उ. प्र. की एक मुख्य मंत्री ने कार्यभार सम्हालते ही निर्देश निर्गत कर दिया था कि 6 माह में अपराधों में 70 प्रतिशत की कमी हो जानी चाहिये। मुख्य मंत्री के आदेश का अक्षरशः पालन करने हेतु कुछ कारगुज़ार पुलिस अधिकारियों ने रिपोर्ट लिखाने आये लोगों को दूर से ही गरियाना और दौड़ाना प्रारम्भ कर दिया| जो नहीं कर पाये, वे मुख्य मंत्री की समीक्षा बैठक के दौरान दंडित हो गये और उनके स्थान पर अधिक कारगुज़ार अधिकारियों की नियुक्ति हो गई। परिणामतः उन मुख्य मंत्री ने अपराध-नियंत्रण में दक्ष होने की सुख्याति अर्जित कर शान से अपना कार्यकाल पूर्ण किया था। 
             
ब. चुनावी सभा का गणित
              मैं वर्ष 1974 में पुलिस अधीक्षक सहारनपुर के पद पर नियुक्त था। एक दिन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की चुनावी सभा आयोजित हुई। सभा के उपरांत उसमें लगभग 20000 की भीड़ होने की सूचना एल. आई. यू. इंस्पेक्टर द्वारा इंटेलीजेंस मुख्यालय को भेज दी गई। उस वायरलेस की प्रतिलिपि जब म्रेरे अवलोकन हेतु प्रस्तुत हुई, तो मेरा गणित का स्कूली शौक जागृत हो गया। मैने हिसाब लगाया कि प्रधान मंत्री के मंच के सामने के चार सेक्टर्स में अधिकतम एक हज़ार व्यक्ति प्रति सेक्टर के हिसाब से चार हज़ार व्यक्ति आ सकते थे, उसके पीछे के चार सेक्टर्स में अधिकतम डेढ़ हज़ार प्रति सेक्टर के हिसाब से 6 हज़ार लोग आ सकते थे। उनके पीछे खड़े हुए लोग और दायें-बांये खड़े पुलिसजन एवं अन्य विभागों के कर्मचारियों को जोड़ते हुए खींचतान कर दो हज़ार लोग और हो सकते थे। इस प्रकार किसी भी प्रकार 12 हज़ार से अधिक का योग नहीं बनता था। मैने एल. आई. यू. इंस्पेक्टर को बुलाकर कहा कि 10-12 हज़ार की संख्या को 20000 क्यों रिपोर्ट किया गया?   मेरी अपेक्षा कहीं अधिक अनुभवी इंस्पेक्टर ने उत्तर दिया,
             “सर, मैने तो फिर भी कम संख्या लिखकर भेजी है। अपनी जनप्रियता साबित करने हेतु नेता तो लखनऊ में 30 हज़ार के ऊपर की संख्या बतायेंगे। उ. प्र. शासन भी प्रधान मंत्री के सामने शासन की जनप्रियता की अच्छी छवि प्रस्तुत करने हेतु बढ़ी हुई संख्या ही रखना चाहेगा। 10-12 हज़ार की संख्या पर तो नेता प्रश्नचिन्ह लगा देंगे। उनमें जो आप से नाख़ुश होंगे, वे मुख्य मंत्री को यह भी कह देंगे कि एस. पी., सहारनपुर विपक्षी मानसिकता के हैं।“
              अनुभवी इन्स्पेक्टर की बात में मुझे दम लगा। 

स. चुनावी परिणाम का अनुमान 
            
                 वर्ष 1977 में मैं इंटेलीजेंस मुख्यालय, लखनऊ में नियुक्त था। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी ने संसद का चुनाव होना घोषित कर दिया था। उन दिनो इंटेलीजेंस के मुखिया श्री श्रीष चंद्र दीक्षित, डी. आई. जी. थे। वह अत्यंत समझदार एवं सुलझे हुए अधिकारी थे। उनसे मुख्य मंत्री ने चुनाव परिणाम का पूर्वानुमान पूछा था। अतः डी. आई. जी. साहब ने मुख्यालय में नियुक्त पुलिस अधीक्षकों की मीटिंग बुलाई थी। प्रदेश के प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के कांग्रेसी उम्मीदवार की स्थिति के विषय में सूचना एकत्र कर हम डी. आई. जी. को अवगत करा रहे थे। डी. आई. जी. साहब तदनुसार उनके नाम के आगे V (Victory), L (Lose)  अथवा D (Doubtful) लिख देते थे| यदि कहीं पर कांग्रेस की हार में ज़रा भी संदेह होता था, तो डी. आई. जी. साहब उस नाम के सामने V (Victory) लिख देते थे। सुल्तानपुर के विषय में सूचना थी कि संजय गांधी न सिर्फ़ हारेंगे, वरन उनकी ज़मानत भी ज़ब्त हो जायेगी। हम सब अवाक थे। डी. आई. जी. साहब कुछ देर तक सोचते रहे, पर शीट पर संजय गांधी के नाम के आगे उन्होंने कुछ नहीं लिखा। आगे रायबरेली का नम्बर आया, तो वहां से भी इंदिरा गांधी के पक्का हारने की रिपोर्ट थी। कुछ देर सोचने के बाद डी. आई. जी. साहब ने इंदिरा गांधी के नाम के आगे V (Victory) लिख दिया और संजय गांधी के नाम के आगे D (Doubtful)  लिख दिया। हम आश्चर्य से यह देख रहे थे, तो वह मुस्कराते हुए बोले,
                   “मैं आप सब से सहमत हूं कि फ़ील्ड रिपोर्ट पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है। पर इन दोनो को हारता हुआ बताकर मैं अनावश्यक बहादुरी नहीं दिखाना चाहता हूं। अगर किसी प्रकार कांग्रेस जीत ही गई, तो मैं तो सदैव के लिये कांग्रेस का शत्रु घोषित हो जाऊंगा।“ 

                                                                                 -क्रमशः

आंकड़ों का खेल ( पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी की फेसबुक वॉल से साभार ।)

आंकड़ों का खेल

भाग-1

                पता नहीं कि चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को शासन चलाने में सफलता के लिये ‘आंकड़ों का खेल’ नामक सूत्र बताया था या नहीं। पर आज के युग में शासकीय-प्रशासकीय कार्यों में इसका प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है और कमोबेश समस्त देशों में हो रहा है। हाल में चीन ने कोरोनावाइरस से हुई मौतों का आंकड़ा लगभग तीन हज़ार बताया था। डब्लू. एच. ओ. की टीम के वहां पहुंचने वाले दिन यह आंकड़ा चार हज़ार के ऊपर हो गया था। चीनी शासन के जानकारों का कहना है कि वास्तविकता इससे तीन-चार गुनी भी हो सकती है। जनतांत्रिक देश भी आंकड़ों का खेल खेलने से परहेज़ नहीं करते हैं। ब्रिटेन के यशस्वी प्रधान मंत्री सर विंस्टन चर्चिल का आंकड़ों से खेल सम्बंधित एक किस्सा बहुत मशहूर है। एक दिन चर्चिल के पास उनका सेक्रेटरी आया। उसके मुख पर घोर निराशा का भाव था। वह बोला, “आफ़्टर सिक्स डेज़ दिस स्टार्ड क्वेश्चन हैज़ टु बी आंसर्ड बाइ यू इन दी पार्लियामेंट्। बट दि इंफ़ौर्मेशन रिक्वायर्ड विल टेक ऐट लीस्ट सिक्स मंथ्स् टु कलेक्ट इट (इस तारांकित प्रश्न का उत्तर आप को छः दिन बाद पार्ल्यामेंट में देना है। परंतु इसमें मांगे गये आंकड़े की सूचना को इकट्ठा करने में कम से कम छः माह लगेंगे)”। चर्चिल ने कहा पत्रावली दिखाओ और फिर उसमें वांछित आंकड़े के स्थान पर एक संख्या लिख दी। सेक्रेटरी आश्चर्य से उनकी ओर देखते हुए बोला, “यदि विपक्ष ने इस संख्या का झूठ साबित कर दिया, तो आप की स्थिति बड़ी नाज़ुक हो जायेगी।“ 

            चर्चिल ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “डोंट वरी. इफ़ हिज़ मैजेस्टी’ज़ गवर्नमेंट विल नीड सिक्स मंथ्स टु कलेक्ट दिस इन्फ़ौर्मेशन, हिज़ मैजेस्टी’ज़ अपोज़ीशन विल टेक ऐट लीस्ट सिक्स इयर्स टु प्रूव दैट इट इज़ फ़ाल्स (चिंता न करें। यदि शासन को यह सूचना एकत्र करने में छः माह लगेंगे, तो विपक्ष को यह साबित  करने में कि यह संख्या ग़लत है, कम से कम छः वर्ष लग जायेंगे)”।

             हम भारतीयों ने शासन एवं प्रशासन ब्रिटिश से सीखा है और किसी ख़ुराफ़ात को अपना लेने की क्षमता में हम उनसे बहुत आगे हैं। इस कारण आंकड़ों के खेल में हम चर्चिल से कम माहिर नहीं हैं। अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की बात हो अथवा विकास की योजनाओं को बनाने एवं कार्यान्वन की बात हो, दोनो में हम आंकड़ों का ऐसा मकड़जाल बुन देते है कि आंकड़ों का यथार्थ से दूर-दूर का सम्बंध न रह जाय। इस क्षेत्र में कतिपय विशेष योग्यता से विभूषित विभागों के कार्यों का वर्णन समीचीन होगा। 

                                                                                                -क्रमशः