Thursday, 27 August 2020

नौकरशाही के भ्रष्टाचार और अन्याय पूर्ण कार्य और राजनैतिक दबाव।( पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह की फेसबुक वॉल से साभार।)

नौकरशाह कहते हैं कि बड़ा टेंशन है, बड़ा प्रेशर है, पर तैनाती जिले में ही चाहिये। अब तो वरिष्ठ सरकारी अधिकारी खुलकर कहते हैं कि मंत्री जी का या फलां फलां का दबाव था। वे अपने भ्रष्टाचार और अन्यायपूर्ण कार्यों के लिए राजनैतिक दबाव को सही और पर्याप्त औचित्य मानते हैं।

कथित ईमानदार अधिकारी भी राजनैतिक इशारे पर गलत काम करने या गलत रिपोर्ट बनाने को सही मानते हैं। श्री हरीशचंद्र गुप्ता, तत्कालीन कोयला सचिव इसी तरह गलत रिपोर्ट बनाने के कारण सजायाब हुये। आश्चर्य है कि नौकरशाही की पूरी लाबी उन्हें बचाने में ईमानदारी से लगी रही। आगे ऐसी अनहोनी न हो, इस उद्देश्य से नौकरशाही ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम को, जो वर्ष 1988 में सुदृढ़ प्रारूप में बनाया गया था, नख-दन्त विहीन कर दिया। दबाव और प्रलोभन में गलत रिपोर्ट बनाने और फर्मों को नाजायज लाभ पहुँचाना अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। और भी व्यापक और विस्तृत संसोधन करके भ्रष्टाचार के लिए सजा होने के सारे रास्ते बन्द कर दिये गए।

वरिष्ठ नौकरशाहों खासकर आई.ए.एस., आई.पी.एस. और प्रथम श्रेणी की सेवाओं के अधिकारियों द्वारा दबाव या तनाव की दलीलें औचित्यरहित एवं शरारतपूर्ण हैं। इस स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को दबाव/तनाव बर्दाश्त करने ही होंगे। इस विषय पर मुझे उत्तर प्रदेश संवर्ग के वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी श्री विजय शंकर पाण्डेय का कथन याद आ रहा है। वर्ष 2011 में वरिष्ठ अधिकारियों (डी.एम./एस.पी./कमिश्नर/डी.आई.जी./आई.जी.) की बैठक में कुछ अधिकारियों द्वारा इसी तरह दबाव/तनाव की दलीलें दी गईं। इस पर श्री विजय शंकर पाण्डेय, जो उस समय अपर कैबिनेट सचिव थे, ने कहा कि-

"ये सेवाएं कमजोर कलेजे वालों के लिए नहीं हैं। जो दबाव/तनाव नहीं झेल सकते, उन्हें दूसरी नौकरी ढूंढ़ लेनी चाहिए अथवा हल्की/शांतिपूर्ण पोस्ट पकड़ लेनी चाहिए"।

मैं यह बातें पुलिस अधिकारियों को ट्रेनिंग के दौरान हमेशा बताया करता था। मैं शोले फिल्म के एक डायलॉग के जरिये भी इस बात को समझाया करता था-
 "शोले में ठाकुर जब जय और वीरू से गब्बर सिंह को पकड़ने के लिए बीस हजार रुपये की बात कहता है तो वीरू कहता है कि गब्बर कोई बकरी का बच्चा है जो दौड़े और पकड़ लिया? इस पर ठाकुर कहता है, "जानता हूँ कि काम मुश्किल है लेकिन आसान काम के इतने पैसे नहीं दिये जाते"। मै प्रशिक्षु अधिकारियों को कहा करता था कि माना कि पुलिस का काम बहुत कठिन है पर याद रखिये कि आसान काम के लिए 'थानेदार या कप्तान' नहीं लगाये जाते।

जिला मैजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को प्रदत्त कानूनी शक्तियां, संसाधन और सुविधायें एवं कार्यभार अत्यंत वृहत और व्यापक होते हैं। इसकी तुलना बड़े-बड़े पदों से भी नहीं की जा सकती है। लिहाजा ये पदाधिकारी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं कर सकते। सरकार और सरकार के माध्यम से अन्ततः जनता यह उम्मीद करती है कि ये पद धारक दृढ़तापूर्वक कार्य करेंगे।

एक बात और मैं अपने तजुर्बे से कहूंगा कि सच्चे, ईमानदार और परिश्रमी अधिकारियों का कोई उत्पीड़न नहीं होता है। अधिकतर यह होता है कि उन्हें किनारे कर दिया जाता है। ठीक है, जो काम मिला है उसे मन लगाकर करिये और चैन से रहिये। इन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को उच्च वेतन, उच्च सुविधाएं, सभी संसाधन मिलते हैं। और सबसे ऊपर, इन अधिकारियों को नागरिक,  बहुत ज्यादा सम्मान देते हैं और विश्वास करते हैं। इसके बाद जनता की यह उम्मीद न्यायपूर्ण है कि ये अधिकारी इतना सब गरीब  जनता के पैसों से पाने के बाद कुछ असुविधायें बर्दाश्त करेंगे। यह सामान्य बात है कि कई अधिकारी ये असुविधायें बर्दाश्त नहीं कर सकते। तब ऐसे अधिकारियों को चाहिए कि वे शान्तिपूर्ण पोस्टिंग लेलें।

यह लिखने का मेरा उद्देश्य यह है कि आम नागरिक और प्रबुद्धजन, नौकरशाही के इन बहानों को स्वीकार न करें। ऐसे उच्च पदाधिकारियों के ये बहाने नहीं सुने/माने जाने चाहिए। ऐसे अधिकारियों को चाहिए कि वे शान्तिपूर्ण/सुरक्षित तैनाती पकड़ लें; बहुत से पद ऐसे हैं!

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