आंकड़ों का खेल (भाग 3- अगस्त 25 की पोस्ट के आगे)
2. सामान्य प्रशासन विभाग
अ. आंकड़े का चहुंदिश खेल-
यद्यपि सभी विभाग आंकड़ों का खेल खेलते हैं परंतु इनके समन्वयक होते हैं सामान्य प्रशासक अर्थात ज़िलाधिकारी, एस. डी. एम., सी. डी. ओ., तहसीलदार आदि। व्यवहारिक रूप में ये विभिन्न विभागों एवं शासन के बीच के बिचौलिये हैं। हम जानते ही हैं कि बिचौलिये न तो माल के उत्पादक होते हैं और न उपभोक्ता, परंतु माल सबसे अधिक वे ही काटते हैं। शराब, तेल, बंदूक, फ़ैक्ट्री, होटल, मेला, सर्कस, सिनेमा, पत्थर, मौरंग आदि किसी का लाइसेंस देना हो, या बाढ़, सूखा, आग, दुर्घटना, कन्या शिक्षा, निर्धन विवाह, ओल्ड-एज पेंशन आदि किसी प्रकार का अनुदान देना हो अथवा मनरेगा, कौशल-विकास, मध्यान्ह-भोज, शिशु-सुरक्षा आदि किसी प्रकार के विकास की मद का पैसा आवंटित करना हो, गंगा बहेगी कलक्टर रूपी गोमुख से ही। अब यदि उस गंगा में कलक्टर आफ़िस के कर्मी डुबकी लगाकर अपने हक का पुण्य अर्जित कर लेते हैं, तो आपत्ति की क्या बात है? इस गंगा स्नान का ‘पुण्य’ अनुदान को खर्च करने के आंकड़े के अनुपात में मिलता है। क्या आंकड़ों में खेल करने का यह पर्याप्त कारण नहीं है?
ग्रामीण विकास की अधिकांश योजनायें उन अधिकारियों द्वारा बनाई जाती हैं, जिहोंने पिकनिक के अवसर के अतिरिक्त ग्राम देखे ही नहीं होते हैं। अतः अधिकांश योजनायें कागज़ पर कार्यान्वित होतीं हैं, उदाहरणार्थ- 1. मेरे ग्राम की आंगनबाड़ी प्रभारी प्रति माह वेतन पातीं थीं, परंतु ग्वालियर में ब्याही थीं और वहीं ससुराल में रहती थीं। 2. एक छोटी सी पोखरी के अतिरिक्त मेरे गांव में ग्राम समाज की कोई ख़ाली ज़मीन ही नहीं है, जहां कोई काम किया जा सके, पर मनरेगा का कार्यक्रम वर्षानुवर्ष चल रहा है और ‘हक’ के अनुसार समस्त भागीदारों का नियमित भुगतान हो रहा है। 3. सरकारी स्कूल में बच्चों को मध्यान्ह भोज बच्चों के आंकड़ों के अनुसार बंट जाता है, चाहे बच्चे आयें या न आयें।
योजनायें इतनी हैं कि अधिकांश अधिकारीगण उन सबके नाम भी नहीं गिना सकते हैं। पर इनके कार्यान्वन को सफल दर्शाने हेतु आंकड़ों का खेल करना उन बिचारों की मजबूरी होती है। और जब आंकड़े बनते हैं, तो अनुदान भी ‘खर्च’ होता ही है। 'खर्च' होकर कहां जाता है, इससे किसी को क्या मतलब?
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