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निवास स्थान पर ही वर्ष में सौ दिन काम देने की गारंटी देते हुए भारत सरकार ने एक " नरेगा " नाम से एक कानून बनाया।
बाद में वर्ष में सौ दिन काम देने वाली इस योजना को सफल मानकर राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को समर्पित करते हुए इसका नाम " मनरेगा " कर दिया गया।
इस योजना के लिए प्रतिवर्ष बहुत बड़ा बजट आवंटित किया जाता है।
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी ने संसद में मनरेगा को कांग्रेस की विफलता का स्मारक बताते हुए इस योजना को जारी रखा।
इस योजना की निगरानी के लिए एक तन्त्र भी बनाया गया तथा शिकायत निवारण तंत्र भी बनाया गया।
निगरानी तंत्र को सक्रिय नहीं किया गया। निगरानी के लिए विभिन्न स्तरों पर मनरेगा लोकपाल की नियुक्ति हेतु विज्ञप्ति तो निकाली गई किन्तु लोकपाल नियुक्त नहीं किए गए।
शिकायत निवारण नियमावली का भी प्रचार प्रसार नहीं किया गया।
कभी भारत सरकार या राज्य सरकार ने इस रोजगार देने की गारंटी वाली योजना की समीक्षा करना भी आवश्यक नहीं समझा कि इस योजना में प्रतिवर्ष किस ग्राम पंचायत में कितने नागरिकों को वर्ष में सौ दिन रोजगार दिया गया।
लाकडाउन में बहुत बड़ी बजट वाली रोजगार गारंटी योजना मनरेगा की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक हो गई।जब पूरे देश में श्रमिकों का हुजूम अपने गांव की ओर उमड़ पड़ा।जो आज भी जारी है।
अब आप ही तय करें कि यह रोजगार गारंटी योजना है या घोटालों की जननी है।
और इसकी आवश्यकता व उपयोगिता क्या है।
वास्तव में आज देश का मजदूर अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर मजबूर है और उसकी मजबूरी को समझने के प्रयास भी नहीं हो रहे हैं।
भारतीय श्रमिक पंचायत
9536162424
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