सम्मान्य रचनाकारों से
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●● गीतिका ●●
मात्रा-पतन दोष मत मानो, कमजोरी तो मानो ।
नये सिरे से काव्य-सृजन के, सब गुण-दोष बखानो ।
भाषा पहले बनी,व्याकरण बहुत बाद में आया ;
फिर इसके अनुसार हुआ परिमार्जन, यह पहचानो ।
कविता-कला कसौटी पर कस, आयी अलख जगाने;
नव रस से भरपूर हुई कण्ठस्थ सहज ही, जानो ।
वार्णिक मात्रिक छन्द रचे अपनी क्षमता से सबने ,
यति गति लय तुक चरण तथा अवरोहारोह मिलानो ।
एक-एक अक्षर शब्दों का संयोजन कर पाना ---
कितना है श्रमसाध्य कार्य यह, कुछ-कुछ तो पहचानो ।
कलाकार से गलाकार बन,खींचो मत मात्राएँ ;
तर्क सुसङ्गत रखो, कुतर्कों से मत अपनी तानो ।
अनुस्वार अनुनासिक सबको, पुनः चलन में लेकर ;
जब जैसे सम्भव हो वैसे, लेखन तजो पुरानो ।
कुछ दिन के अभ्यास बाद सब कुछ सम्भव हो रुचिकर,
अखबारों का उदाहरण दे, करो न बन्धु बहानो ।
विश्व-पटल पर चमका दो फिर से शुचि हिन्दी भाषा ,
अपवादों को छोड़ , ठान पूरी करने की ठानो ।
संस्कृत की बेटी है हिन्दी, वही वर्णमाला है ;
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